US Reko Diq Investment: पाकिस्तान के सबसे अशांत और संवेदनशील प्रांत बलूचिस्तान में एक बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। जहाँ एक ओर स्थानीय लोग अपनी आजादी और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने यहाँ माइनिंग के लिए 1.3 बिलियन डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। पाकिस्तान सरकार को बलूचिस्तान के विशाल तांबे और सोने के भंडार के लिए यह विदेशी निवेश ऐसे समय में मिला है जब देश गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है। बलूचिस्तान को दुनिया के सबसे बड़े अविकसित खनिज भंडारों में से एक माना जाता है और अब सुपरपावर की एंट्री से यहाँ के समीकरण बदलने वाले हैं।
रेको दिक प्रोजेक्ट: 7 अरब डॉलर की लागत और भविष्य की योजना
इस महात्वाकांक्षी परियोजना का नाम ‘रेको दिक प्रोजेक्ट’ है, जो पाकिस्तान-ईरान सीमा के पास स्थित है। कुल 7 अरब डॉलर की लागत वाले इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य साल 2028 के अंत तक उत्पादन शुरू करना है। यह प्रोजेक्ट न केवल पाकिस्तान के लिए बल्कि वैश्विक खनिज बाजार के लिए भी गेम-चेंजर साबित हो सकता है। उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र में होने के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय कंपनियां यहाँ के कीमती खनिजों के दोहन के लिए बड़ी पूंजी लगा रही हैं।
कनाडा और अमेरिका की जुगलबंदी: क्रिटिकल मिनरल्स पर कब्जा
रेको दिक प्रोजेक्ट को मुख्य रूप से कनाडा की दिग्गज कंपनी बैरिक माइनिंग कॉर्प और पाकिस्तान सरकार की साझेदारी में विकसित किया जा रहा है। इसमें अमेरिका का हित ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ (महत्वपूर्ण खनिजों) की सप्लाई चेन को सुरक्षित करना है। अमेरिका अपने निर्यात-आयात बैंक (EXIM) के माध्यम से यह निवेश कर रहा है।
बैरिक माइनिंग: 50 प्रतिशत हिस्सेदारी।
केंद्र सरकार (पाक): 25 प्रतिशत स्वामित्व।
बलूचिस्तान सरकार: 25 प्रतिशत हिस्सा (जिसमें से 15% वित्त पोषित और 10% मुक्त आधार पर)।
चीन को चुनौती: सप्लाई चेन में विविधता लाने की अमेरिकी रणनीति
इस निवेश का एक गहरा भू-राजनीतिक महत्व भी है। वर्तमान में महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर चीन का दबदबा है। अमेरिका चाहता है कि वह चीन पर अपनी निर्भरता कम करे और सप्लाई चेन में विविधता लाए। पाकिस्तान के साथ आर्थिक संबंध मजबूत कर अमेरिका इस रणनीतिक क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाना चाहता है। शहबाज शरीफ सरकार ने इस निवेश का स्वागत करते हुए इसे देश के खनन क्षेत्र और आर्थिक सुधारों के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ‘विश्वास मत’ बताया है।
बलूच बागियों का खतरा: सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी चुनौतियां
भले ही कागज पर यह डील अरबों डॉलर की दिख रही हो, लेकिन जमीन पर हकीकत बेहद चुनौतीपूर्ण है। बलूचिस्तान में अलगाववादी संगठन, विशेषकर बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA), बाहरी कंपनियों और संसाधनों के दोहन के सख्त खिलाफ हैं। खदान से निकले तांबे और सोने को प्रोसेसिंग के लिए कराची बंदरगाह तक पहुँचाना एक जोखिम भरा काम होगा। इसके लिए रेलवे लाइन को अपग्रेड करना होगा, जबकि बलूच बागी लगातार ट्रेनों और बुनियादी ढांचे को निशाना बना रहे हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के बिना इस प्रोजेक्ट को सफलतापूर्वक चलाना एक बड़ी सिरदर्दी साबित हो सकता है।
विकास या विनाश की ओर बलूचिस्तान?
इस्लामाबाद को उम्मीद है कि रेको दिक प्रोजेक्ट अपने जीवनकाल में अरबों डॉलर का राजस्व प्रदान करेगा और पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा देगा। हालांकि, स्थानीय जनता की नाराजगी और सुरक्षा संबंधी खतरों को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि इस प्रोजेक्ट का लाभ बलूचिस्तान के आम लोगों तक पहुँचेगा या यह केवल वैश्विक शक्तियों के बीच संसाधनों की एक और जंग बनकर रह जाएगा।
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