Iran-US War: भारत आ रहा ईरानी तेल का टैंकर अचानक चीन की ओर क्यों मुड़ा? मोदी सरकार ने संसद में दिया ये जवाब

ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के दौरान, भारत के लिए रवाना हुआ एक विशाल तेल टैंकर (VLCC) अचानक अपना रास्ता बदलकर चीन की ओर चला गया। विपक्ष के सवालों और देश में तेल की कीमतों पर उठते संशय के बीच, केंद्र सरकार ने इस 'डायवर्जन' की असली वजह बताई है।

Iran-US War

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 4, 2026

Iran-US War: भारत सरकार ने शनिवार, 4 अप्रैल 2026 को उन तमाम मीडिया रिपोर्ट्स और अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि ईरानी कच्चे तेल से लदा एक विशाल टैंकर भुगतान (Payment) संबंधी विवादों के कारण भारत का रास्ता छोड़ चीन की ओर मुड़ गया है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया कि भारत को कच्चे तेल के आयात या उसके भुगतान को सुरक्षित करने में किसी भी प्रकार की वित्तीय बाधा का सामना नहीं करना पड़ा है। सरकार ने जोर देकर कहा कि भारतीय तेल कंपनियां पूरी तरह स्वतंत्र हैं और वर्तमान में भारत दुनिया के 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल आयात कर अपनी ऊर्जा जरूरतों को बिना किसी रुकावट के पूरा कर रहा है।

ईरानी जहाज का गंतव्य बदलना: ऑपरेशनल फ्रीडम या कुछ और?

मंत्रालय ने उन दावों पर भी स्पष्टीकरण दिया जिनमें ‘पिंग शुन’ नामक टैंकर के गुजरात के वाडिनार बंदरगाह के बजाय चीन के दोंगयिंग की ओर जाने की बात कही गई थी। सरकार के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार की पेचीदगियों को समझे बिना ऐसी खबरें फैलाई जा रही हैं। मंत्रालय ने समझाया कि ‘बिल ऑफ लैंडिंग’ (Bill of Lading) में अक्सर सुरक्षा और व्यापारिक सुगमता के लिए कई संभावित बंदरगाहों के नाम दर्ज होते हैं। समुद्र में कार्गो जहाजों को ‘ऑपरेशनल फ्रीडम’ होती है, जिसके तहत वे बेहतर व्यावसायिक सौदों या रसद (Logistics) संबंधी कारणों से अपना गंतव्य बदल सकते हैं। इसे केवल भुगतान संकट से जोड़कर देखना पूरी तरह गलत और भ्रामक है।

मिडिल-ईस्ट संकट के बावजूद भारत की तेल आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित

वैश्विक स्तर पर और विशेषकर मध्य-पूर्व (मिडिल-ईस्ट) में जारी तनाव के बावजूद, भारत सरकार ने देशवासियों को आश्वस्त किया है कि आगामी महीनों के लिए कच्चे तेल की आवश्यकताएं पूरी तरह सुरक्षित हैं। मंत्रालय ने कहा कि भारत ने ईरान सहित अन्य स्रोतों से अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पुख्ता इंतजाम किए हैं। सरकार ने एलपीजी (LPG) आपूर्ति को लेकर भी स्पष्ट आंकड़े पेश किए। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, ‘सी बर्ड’ नाम का एक जहाज करीब 44,000 मीट्रिक टन ईरानी गैस लेकर 2 अप्रैल को ही मंगलुरु पोर्ट पर पहुंच चुका है, जहां वर्तमान में गैस उतारने (Unloading) का काम सुचारू रूप से जारी है।

ट्रैकिंग कंपनियों के दावे और रिफाइनरी की स्थिति

जहाज ट्रैकिंग फर्म ‘कप्लर’ (Kpler) ने पहले यह दावा किया था कि ‘पिंग शुन’ नामक अफ्रामैक्स टैंकर वाडिनार की ओर आ रहा था, जहां रूसी कंपनी रोसनेफ्ट समर्थित ‘नायरा एनर्जी’ की विशाल रिफाइनरी स्थित है। कप्लर के विश्लेषकों का मानना था कि भुगतान की शर्तों में बदलाव के कारण जहाज चीन की ओर मुड़ गया। हालांकि, भारतीय रिफाइनर वर्तमान में अमेरिकी प्रतिबंधों में मिली अस्थायी ढील के बाद ईरानी तेल की खरीद की संभावनाएं तलाश रहे हैं। भारत सरकार ने इस पर कहा कि ईरानी तेल की खरीद फिर से शुरू करना पूरी तरह से तकनीकी मापदंडों और व्यावसायिक लाभ पर निर्भर करेगा, न कि किसी बाहरी दबाव या वित्तीय असफलता पर।

ईरानी कच्चे तेल का ऐतिहासिक खरीदार रहा है भारत

ऐतिहासिक रूप से भारत, ईरान से कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में से एक रहा है। दोनों देशों के बीच तेल व्यापार के गहरे और पुराने संबंध हैं। तेल मंत्रालय ने पुन: स्पष्ट किया है कि किसी भी देश से तेल खरीदने का निर्णय केवल ‘कमर्शियल वायबिलिटी’ (व्यावसायिक व्यवहार्यता) के आधार पर लिया जाता है। पेमेंट संबंधी जो भी रिपोर्ट मीडिया में चल रही हैं, वे केवल अफवाहें हैं और इनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। भारत का ऊर्जा क्षेत्र वर्तमान में सबसे स्थिर दौर में है और अंतरराष्ट्रीय बाजार की उथल-पुथल का असर देश की घरेलू आपूर्ति पर नहीं पड़ने दिया जाएगा।

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