Iran-US War Impact: पश्चिम एशिया के रणक्षेत्र में गहराते युद्ध के बादलों ने भारत की पेशानी पर बल डाल दिए हैं। अमेरिका और ईरान के बीच पिछले चार हफ्तों से जारी भीषण सैन्य संघर्ष पर देश की बाहरी खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ (RAW) के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद ने एक गंभीर चेतावनी जारी की है। सूद का मानना है कि यदि यह युद्ध जल्द नहीं थमा, तो भारत न केवल गहरे ऊर्जा संकट की गिरफ्त में फंस जाएगा, बल्कि देश में महंगाई का एक ऐसा अनियंत्रित दौर शुरू हो सकता है जो आम आदमी की कमर तोड़ देगा। उनके अनुसार, यह संघर्ष अब केवल दो देशों की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है।
आपूर्ति श्रृंखला पर संकट: 2-3 महीने में दिखेगा वास्तविक असर
विक्रम सूद ने एक विशेष चर्चा के दौरान स्पष्ट किया कि भारत के लिए असली परीक्षा आने वाले दो से तीन महीनों में शुरू होगी। उन्होंने आगाह किया कि भारत के पास कच्चे तेल और फर्टिलाइजर (उर्वरक) का भंडार सीमित है। भारत अपनी एलएनजी (LNG) जरूरतों के लिए कतर पर और कच्चे तेल के लिए सऊदी अरब व अन्य मध्य पूर्वी देशों पर निर्भर है। यदि युद्ध के कारण इन देशों से होने वाली आपूर्ति बाधित होती है या कीमतें आसमान छूती हैं, तो भारतीय बाजार में जरूरी वस्तुओं के दाम पर काबू पाना सरकार के लिए लगभग असंभव हो जाएगा। यह स्थिति सीधे तौर पर भारत की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करेगी।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का महत्व और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन
पूर्व रॉ प्रमुख ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को भारत की आर्थिक जीवनरेखा बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की व्यापारिक और ऊर्जा सुरक्षा पूरी तरह इस समुद्री रास्ते की सुगमता पर टिकी है। हालांकि उन्होंने इज़राइल को भारत का एक महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोगी माना, लेकिन ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मृत्यु को ‘दुर्भाग्यपूर्ण हत्या’ करार दिया। सूद के मुताबिक, अमेरिका का इस युद्ध में सीधे तौर पर कूदना अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ताक पर रखकर एक संप्रभु देश के खिलाफ छेड़ा गया ‘अघोषित युद्ध’ है, जो वैश्विक कूटनीति के लिए एक बुरा संकेत है।
ईरान का पलटवार और इज़राइल के वर्चस्व की योजना
विक्रम सूद का विश्लेषण है कि अमेरिका और इज़राइल ने ईरान की जमीनी ताकत और उसके प्रतिरोध की क्षमता को आंकने में बड़ी रणनीतिक भूल की है। ईरान इस भारी दबाव का मजबूती से मुकाबला कर रहा है। भू-राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि इस युद्ध का छिपा हुआ उद्देश्य ईरान के अस्तित्व को मिटाकर पूरे क्षेत्र का नियंत्रण इज़राइल को सौंपना हो सकता है। सूद ने स्पष्ट किया कि भारत इस संकट में एक पीड़ित पक्ष की तरह है, क्योंकि यह युद्ध हम पर थोपा गया है और हम अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए होर्मुज के रास्ते पर निर्भर रहने को मजबूर हैं।
परमाणु ठिकानों पर हमले और वैश्विक बाजार में मची हलचल
युद्ध अब एक विनाशकारी मोड़ पर पहुंच गया है। मंगलवार को अमेरिकी सेना ने ईरान के इस्फहान शहर में स्थित एक प्रमुख परमाणु केंद्र को निशाना बनाया, जिससे पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया है। इसके जवाब में तेहरान ने दुबई तट के पास एक कुवैती तेल टैंकर पर हमला कर अपनी आक्रामकता का परिचय दिया है। इन घटनाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अस्थिर हो गई हैं। इसका सीधा असर भारत में हवाई किराए, माल ढुलाई और सामान्य परिवहन लागत पर पड़ना तय है। केंद्र सरकार ने पहले ही सभी राज्यों को इस संभावित आर्थिक झटके से निपटने के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए हैं।
भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
31 मार्च 2026 की यह स्थिति दर्शाती है कि भारत एक अत्यंत नाजुक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ हमारे सामरिक हित इज़राइल से जुड़े हैं, तो दूसरी तरफ हमारी ऊर्जा सुरक्षा ईरान और खाड़ी देशों के रास्तों पर निर्भर है। आने वाले समय में भारत को अपनी कूटनीति का परिचय देते हुए न केवल अपने आर्थिक हितों की रक्षा करनी होगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति बहाली के लिए भी प्रयास तेज करने होंगे। फिलहाल, तेल की बढ़ती कीमतें और युद्ध की अनिश्चितता भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है।
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