Iran-US Ceasefire Row: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच एक राहत भरी खबर सामने आई है। अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के सशर्त सीजफायर (युद्धविराम) पर सहमति बन गई है। इस समझौते का उद्देश्य क्षेत्र में जारी हिंसा को अस्थायी रूप से रोकना और भविष्य की स्थायी शांति वार्ताओं के लिए जमीन तैयार करना है। हालांकि, इस समझौते के लागू होते ही कूटनीतिक हलकों में यह बहस तेज हो गई है कि आखिर इस जटिल बातचीत को अंजाम तक पहुँचाने में असली भूमिका किसकी रही। पाकिस्तान इस सफलता का पूरा श्रेय खुद को दे रहा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय विशेषकर इजरायल ने इन दावों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
पाकिस्तान का आत्ममुग्ध अंदाज: विदेश मंत्री ने थपथपाई अपनी पीठ
पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बुधवार को इस्लामाबाद में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान इसे पाकिस्तान की बड़ी कूटनीतिक जीत बताया। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि पाकिस्तान को अब वैश्विक स्तर पर एक ‘भरोसेमंद’ मध्यस्थ के रूप में मान्यता मिल रही है। आसिफ ने दावा किया कि पाकिस्तान ने ही दोनों पक्षों के संदेश एक-दूसरे तक पहुँचाए और इस कठिन समझौते को मुमकिन बनाया। उन्होंने इसे पाकिस्तानी नेतृत्व की बड़ी सफलता करार देते हुए कहा कि अरब देशों, ईरान और यहाँ तक कि अमेरिका ने भी पाकिस्तान की काबिलियत पर भरोसा दिखाया है।
इजरायल का पलटवार: पाकिस्तान को बताया ‘अविश्वसनीय पक्ष’
पाकिस्तान जहाँ अपनी पीठ थपथपा रहा है, वहीं भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने पाकिस्तान की मध्यस्थता पर पानी फेर दिया है। एक कड़े बयान में अजार ने कहा कि इजरायल इस्लामाबाद को किसी भी तरह से “विश्वसनीय पक्ष” के रूप में नहीं देखता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान की भूमिका केवल संदेशवाहक की रही होगी, न कि किसी प्रभावशाली मध्यस्थ की। इजरायल के इस रुख ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की छवि को लेकर चल रहे दावों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
अमेरिका की मजबूरी या रणनीति? राजदूत ने किया कटाक्ष
रूवेन अजार ने अमेरिका द्वारा पाकिस्तान का इस्तेमाल किए जाने पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने निजी और सामरिक कारणों से पाकिस्तान की सेवाओं का उपयोग करने का फैसला लिया होगा। उन्होंने अतीत का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका ने पहले भी कतर और तुर्की जैसे ‘समस्याग्रस्त’ देशों का उपयोग हमास के साथ बातचीत के लिए किया है। अजार के अनुसार, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि पाकिस्तान एक भरोसेमंद राष्ट्र बन गया है, बल्कि यह केवल अमेरिका की एक रणनीतिक आवश्यकता मात्र हो सकती है।
मध्यस्थता का सच: क्या वाकई पाकिस्तान ने बदला क्षेत्र का भविष्य?
ख्वाजा आसिफ का मानना है कि इस समझौते के बाद पाकिस्तान एक नए युग में प्रवेश कर चुका है और क्षेत्र में स्थिरता कायम होगी। उनके अनुसार, ईरान और अमेरिका दोनों ने पाकिस्तान में विश्वास दिखाया है। लेकिन विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान की ओर से ‘बढ़ा-चढ़ाकर’ पेश किया गया दावा मान रहे हैं। पाकिस्तान इस समय गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को एक ‘शांतिदूत’ के रूप में पेश करना उसकी मजबूरी भी हो सकती है ताकि वह वैश्विक शक्तियों की गुड बुक्स में आ सके।
परिणाम और तालमेल का महत्व
इजरायली राजदूत ने जोर देकर कहा कि इजरायल के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि परिणाम उनकी उम्मीदों के अनुरूप हों और अमेरिका के साथ उनका तालमेल बना रहे। इजरायल को पाकिस्तान की नीयत पर संदेह है, क्योंकि पाकिस्तान के ऐतिहासिक संबंध कई कट्टरपंथी समूहों के साथ रहे हैं। ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि यह दो हफ्ते का सीजफायर स्थायी शांति में बदल पाता है या नहीं, और क्या पाकिस्तान वाकई अपनी खोई हुई अंतरराष्ट्रीय साख वापस पाने में सफल होता है। फिलहाल, श्रेय लेने की इस होड़ ने कूटनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है।
Read more: Meerut News: मेरठ में सेंट्रल मार्केट बंद, व्यापारियों ने सीलिंग के विरोध में किया जोरदार प्रदर्शन










