US-Israel-Iran War: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने पूरी दुनिया की धड़कनें तेज कर दी हैं। इस संघर्ष के केंद्र में ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक बिंदु बनकर उभरा है। इसकी अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग 20% और तरल प्राकृतिक गैस (LNG) का एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। भारत समेत कई एशियाई देशों की ऊर्जा सुरक्षा सीधे तौर पर इस मार्ग की स्थिरता पर निर्भर है। वर्तमान में ईरान ने इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक निगरानी और सैन्य सक्रियता को चरम पर पहुँचा दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भारी अनिश्चितता और घबराहट का माहौल पैदा हो गया है।
नया मोर्चा: बाब-अल-मांदेब जलडमरूमध्य पर भी मंडराया ईरान का खतरा
खतरा अब केवल होर्मुज तक सीमित नहीं रह गया है। ईरान ने संकेत दिए हैं कि यदि उस पर सैन्य दबाव या हमले जारी रहते हैं, तो वह एक और बेहद संवेदनशील समुद्री रास्ते ‘बाब-अल-मांदेब’ (Bab-el-Mandeb) को भी बाधित कर सकता है। ईरान की शक्तिशाली सैन्य इकाई ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर’ (IRGC) से जुड़े सूत्रों का दावा है कि उनके पास इस पूरे क्षेत्र में परिचालन को ठप करने की पूरी क्षमता और तकनीक मौजूद है। यह जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है, जो यमन, जिबूती और इरिट्रिया के बीच स्थित एक संकरा लेकिन सामरिक रूप से अनिवार्य मार्ग है।
वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा: स्वेज नहर और 12% समुद्री व्यापार पर संकट
बाब-अल-मांदेब को वैश्विक व्यापार की ‘जीवनरेखा’ माना जाता है। दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 12% हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। स्वेज नहर की ओर जाने वाले हर मालवाहक जहाज के लिए यह प्रवेश द्वार की तरह है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान होर्मुज और बाब-अल-मांदेब, दोनों रास्तों पर दबाव बनाने में सफल रहता है, तो वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 30% हिस्सा पूरी तरह प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में जहाजों को अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ का चक्कर लगाकर लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा, जिससे माल ढुलाई का समय और लागत दोनों में बेतहाशा बढ़ोतरी होगी, जिसका सीधा असर वैश्विक महंगाई पर पड़ेगा।
हूथी विद्रोहियों का उपद्रव: जहाजों की सुरक्षा पर खर्च हो रहे अरबों डॉलर
इस क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां पहले से ही गंभीर बनी हुई हैं। यमन में सक्रिय और ईरान समर्थित माने जाने वाले हूथी विद्रोही लगातार वाणिज्यिक जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमले कर रहे हैं। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन हमलों के कारण अब तक कई जहाज समुद्र में समा चुके हैं और जहाजों की सुरक्षा व बीमा पर दुनिया भर की कंपनियों को अरबों डॉलर का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ रहा है। ईरान द्वारा इस मार्ग को आधिकारिक तौर पर बाधित करने की धमकी ने जलते हुए मिडिल ईस्ट में ‘आग में घी’ डालने का काम किया है।
आर्थिक मंदी की आशंका: पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा गंभीर प्रभाव
कुल मिलाकर, अगर ईरान इन दो प्रमुख समुद्री गलियारों को युद्ध के हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। यह एक वैश्विक आर्थिक सुनामी का रूप ले सकता है। ऊर्जा आपूर्ति ठप होने से उद्योगों का पहिया थम सकता है और आवश्यक वस्तुओं की किल्लत पूरी दुनिया में पैदा हो सकती है। कूटनीतिक जानकार इसे ईरान की ‘प्रेशर टैक्टिक्स’ (दबाव की राजनीति) मान रहे हैं, लेकिन अगर यह धमकी हकीकत में बदलती है, तो 21वीं सदी का सबसे बड़ा आर्थिक और सुरक्षा संकट पैदा होना तय है।









