Iran EU Military Conflict: मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में भू-राजनीतिक तनाव एक ऐसी खतरनाक स्थिति में पहुँच गया है, जहाँ सैन्य टकराव अपरिहार्य प्रतीत हो रहा है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी भी क्षण ईरान के विरुद्ध प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई का आदेश दे सकते हैं। अमेरिका की इस आक्रामकता के जवाब में ईरान ने भी अपनी रक्षात्मक और कूटनीतिक घेराबंदी तेज कर दी है। इसी कड़ी में, ईरान ने एक बड़ा कदम उठाते हुए यूरोपीय संघ (EU) के सदस्य देशों की नौसेना और वायु सेना को आधिकारिक रूप से ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित कर दिया है। यह निर्णय न केवल कूटनीतिक संबंधों में गिरावट को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करता है।
प्रतिशोधात्मक कार्रवाई: साल 2019 के फैसले का लिया बदला
ईरान का यह कड़ा कदम अचानक नहीं लिया गया है, बल्कि यह साल 2019 में यूरोपीय संघ द्वारा लिए गए एक विवादास्पद निर्णय का प्रतिकार है। उस समय यूरोपीय संघ ने ईरान की शक्तिशाली सैन्य शाखा ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) पर गंभीर आरोप लगाते हुए उसे आतंकी सूची में डाल दिया था। ईरान ने तब से ही इस अपमान का बदला लेने की योजना बनाई थी। ईरानी अधिकारियों का तर्क है कि यदि यूरोपीय संघ उनकी संप्रभु सेना को आतंकी संगठन मान सकता है, तो ईरान को भी ईयू के सैन्य बलों के साथ समान व्यवहार करने का पूर्ण अधिकार है। यह ‘जैसे को तैसा’ वाली नीति अब क्षेत्र में सैन्य तनाव को चरम पर ले जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन: ईरान ने दी दलील
ईरानी विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में एक विस्तृत आधिकारिक बयान जारी किया है। मंत्रालय के अनुसार, यूरोपीय संघ द्वारा IRGC के खिलाफ की गई कार्रवाई संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के बुनियादी सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है। ईरान ने अपने ‘पारस्परिक कार्रवाई संबंधी कानून’ के अनुच्छेद 7 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जो भी देश अमेरिका की ईरान-विरोधी नीतियों का समर्थन करेगा या IRGC को आतंकी मानने के फैसले का पालन करेगा, उसे ईरान के प्रतिशोधात्मक कानूनों का सामना करना पड़ेगा। ईरान इस कदम को अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए उठाया गया एक कानूनी और जायज कदम बता रहा है।
IRGC बनाम अल-कायदा: एक सैन्य बल की वैश्विक छवि
यूरोपीय संघ द्वारा IRGC को आतंकी घोषित किए जाने का अर्थ यह है कि अब इस ईरानी सैन्य बल को ‘इस्लामिक स्टेट’ (ISIS) और ‘अल-कायदा’ जैसे खतरनाक संगठनों की श्रेणी में रखा गया है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद गठित IRGC केवल एक सैन्य बल नहीं है, बल्कि यह ईरान की अर्थव्यवस्था, राजनीति और रक्षा प्रणाली की रीढ़ है। यह संगठन देश के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और परमाणु ऊर्जा विकास की पूरी निगरानी करता है। ईरान इसे अपनी पहचान और अस्तित्व की रक्षा करने वाला रक्षक मानता है, जबकि पश्चिमी देश इसे आतंकवाद को वित्तपोषित करने वाला मुख्य स्रोत करार देते हैं।
परमाणु कार्यक्रम पर तनाव: ट्रंप का 15 दिनों का अल्टीमेटम
इस पूरे विवाद की जड़ ईरान का विवादित यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम है। अमेरिका, इजरायल और उनके सहयोगी देश इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु हथियार विकसित कर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मुद्दे पर अब तक की सबसे कड़ी चेतावनी देते हुए ईरान को मात्र 10 से 15 दिनों का समय दिया है। ट्रंप की मांग है कि ईरान तत्काल प्रभाव से परमाणु समझौते पर अमेरिका की शर्तों के साथ हस्ताक्षर करे, अन्यथा उसे ऐसे ‘गंभीर परिणाम’ भुगतने होंगे जिन्हें दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा। ईरान द्वारा ईयू बलों को आतंकी घोषित करना इसी दबाव के खिलाफ एक कूटनीतिक रक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा है।









