Indus Waters Treaty: भारत ने सोमवार, 31 अगस्त 2026 को सिंधु जल संधि से जुड़े विश्व बैंक की मध्यस्थता वाली कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) के फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। भारत सरकार ने इस अदालत के अधिकार क्षेत्र पर ही सवाल उठाते हुए इसे अवैध करार दिया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि CoA की ओर से जारी किसी भी आदेश या फैसले का भारत के संप्रभु निर्णयों और जल परियोजनाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। भारत ने एक बार फिर सिंधु जल संधि को फिलहाल स्थगित रखने के अपने फैसले को दोहराया है।
विदेश मंत्रालय ने अदालत के गठन पर उठाए सवाल
विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के कानूनी अस्तित्व को कभी स्वीकार नहीं किया है। भारत का तर्क है कि विश्व बैंक ने सिंधु जल संधि में निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए इस अदालत का गठन किया। इसी आधार पर भारत ने इसकी कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया और न ही इसके फैसलों को मान्यता दी। विदेश मंत्रालय के अनुसार, जिस संस्था के गठन की प्रक्रिया ही संधि के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है, उसके आदेश भारत के लिए बाध्यकारी नहीं हो सकते।
भारत ने CoA के अधिकार क्षेत्र को किया खारिज
भारत सरकार का कहना है कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को भारत के संप्रभु फैसलों पर निर्णय देने का अधिकार नहीं है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने पहले भी इस अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया था और आगे भी इसके किसी आदेश को अपनी नीतियों पर प्रभावी नहीं मानेगा। मंत्रालय के मुताबिक, वर्तमान या भविष्य में CoA की ओर से दिए जाने वाले फैसलों का भारत की जल परियोजनाओं पर कोई असर नहीं होगा। भारत अपने राष्ट्रीय हितों और संप्रभु अधिकारों के अनुसार जल संसाधनों से जुड़े निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र रहेगा।
सिंधु जल संधि स्थगित रखने का फैसला कायम
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि भारत सरकार का सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का निर्णय प्रभावी रहेगा। मंत्रालय ने कहा कि CoA के किसी भी आदेश से इस फैसले में बदलाव नहीं होगा। भारत ने संधि को स्थगित करने के पीछे अपने राष्ट्रीय हितों और परिस्थितियों को महत्वपूर्ण आधार माना है। सरकार का रुख है कि जिस मध्यस्थता प्रक्रिया को भारत ने वैध नहीं माना, उसके फैसले के आधार पर संधि को लेकर भारत की वर्तमान नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा।
CoA ने संधि को बताया पूरी तरह लागू
दूसरी ओर, कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने अपने फैसले में कहा है कि सिंधु जल संधि अभी भी पूरी तरह लागू है। अदालत ने अपने निष्कर्ष में कहा कि भारत को संधि के तहत निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए। CoA ने भारत की ओर से संधि को स्थगित रखने के लिए बताए गए कारणों की भी समीक्षा की। अदालत के मुताबिक, भारत द्वारा प्रस्तुत आधार संधि को निलंबित करने या समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
भारत और CoA के रुख में साफ अंतर
इस पूरे मामले में भारत और कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का रुख एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नजर आ रहा है। CoA जहां सिंधु जल संधि को प्रभावी मानते हुए भारत को उसके प्रावधानों के तहत आगे बढ़ने की बात कह रहा है, वहीं भारत अदालत के गठन और अधिकार क्षेत्र को ही अस्वीकार कर रहा है। भारत का कहना है कि CoA की कार्यवाही में शामिल होना उसके रुख को कमजोर कर सकता था, इसलिए उसने शुरुआत से ही इस प्रक्रिया को मान्यता नहीं दी।
जल परियोजनाओं पर भारत का रुख स्पष्ट
भारत ने दोहराया है कि CoA के फैसले उसकी जल परियोजनाओं को प्रभावित नहीं करेंगे। विदेश मंत्रालय के बयान से संकेत मिलता है कि सरकार सिंधु नदी प्रणाली से संबंधित अपने फैसलों को राष्ट्रीय हितों के आधार पर आगे बढ़ाना चाहती है। फिलहाल दोनों पक्षों के रुख में स्पष्ट मतभेद बना हुआ है। एक ओर CoA संधि को लागू मान रहा है, जबकि भारत उसके अधिकार क्षेत्र को ही चुनौती दे रहा है। ऐसे में सिंधु जल संधि को लेकर आने वाले समय में भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक एवं कानूनी विवाद और महत्वपूर्ण हो सकता है।
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