जहां चलता था भतीजे का दबदबा, वहां TMC के झंडे तक नहीं बचे

कलकत्ता पश्चिम बंगाल के फलता को तृणमूल कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था। यह लोकसभा सांसद और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक के संसदीय क्षेत्र में भी आता है। इसकी बड़ी वजह यहां पर जहांगीर खान के प्रभाव को माना जाता था। अब नौबत यह है कि खुद जहांगीर अंत समय में चुनावी मैदान छोड़कर चले गए और नतीजा यह हुआ कि टीएमसी पूर्व सीएम बनर्जी के भवानीपुर के बाद एक और गढ़ गंवाने की कगार पर है। कुछ दिनों में बदले हालात 29 अप्रैल को जब पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण का मतदान होना था, तो उसमें

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Published On :

मई 22, 2026

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कलकत्ता

पश्चिम बंगाल के फलता को तृणमूल कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था। यह लोकसभा सांसद और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक के संसदीय क्षेत्र में भी आता है। इसकी बड़ी वजह यहां पर जहांगीर खान के प्रभाव को माना जाता था। अब नौबत यह है कि खुद जहांगीर अंत समय में चुनावी मैदान छोड़कर चले गए और नतीजा यह हुआ कि टीएमसी पूर्व सीएम बनर्जी के भवानीपुर के बाद एक और गढ़ गंवाने की कगार पर है।

कुछ दिनों में बदले हालात
29 अप्रैल को जब पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण का मतदान होना था, तो उसमें फलता भी शामिल था। उस दौरान क्षेत्र के हर हिस्से में टीएमसी के झंडे और पार्टी कार्यकर्ता मौजूद थे। अब कुछ ही दिनों में स्थिति बदल गई है और अब जगह दूसरे दलों के झंडों से लदी हुई है। टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विधानसभा क्षेत्र में टीएमसी एक झंडा भी नजर नहीं आ रहा था।

वहीं, इस सीट पर बाहुबली छवि वाले जहांगीर खान भी चुनाव से हटने के बाद क्षेत्र से नदारद हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वह गुरुवार को हुए मतदान में भी शामिल नहीं हुए। अखबार से बातचीत में स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें आखिरी बार मंगलवार को देखा गया था। खास बात है कि मंगलवार को ही खान ने चुनाव से हटने का फैसला किया था।

अभिषेक बनर्जी का चलता था सिक्का
जहांगीर खान को डायमंड हार्बर सांसद अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता है। साल 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से उन्हें 89 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। अब जब खान ने चुनाव से नाम वापस लिया, तो टीएमसी ने इससे किनारा किया और खान का निजी फैसला बताया।

बंपर वोटिंग हुई
गुरुवार को सीट पर पुनर्मतदान शांतिपूर्ण तरीके से हुआ जहां 86 फीसदी से अधिक लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। इस दौरान केंद्रीय बलों की भारी तैनाती रही। यह पुनर्मतदान 29 अप्रैल के चुनाव से जुड़े विवाद के कारण हुआ, जब कई मतदान केंद्रों से शिकायतें सामने आईं कि ईवीएम पर इत्र जैसे पदार्थ और चिपकने वाली टेप लगाई गई थीं।

भाजपा और लेफ्ट में मुकाबला
खान के हटने के बाद इस सीट पर टीएमसी के पास दावेदारी ही नहीं बची। ऐसे में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के देबांग्शु पांडा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के शंभूनाथ कुर्मी के बीच माना जा रहा है। सीट पर कांग्रेस की तरफ से अब्दुर रज्जाक मोल्ला चुनाव लड़ रहे हैं।

भवानीपुर गंवाया
4 मई को जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में ममता बनर्जी के भवानीपुर सीट से हारने की खबर आई। खास बात है कि उन्हें अब बंगाल के मुख्यमंत्री बने शुभेंदु अधिकारी ने ही 15 हजार से ज्यादा मतों से हराया था। इससे पहले वह 2021 के चुनाव में अधिकारी के सामने नंदीग्राम सीट से भी हार का सामना कर चुकी हैं।

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