Eminent Historian Dies: भारतीय इतिहास लेखन और शिक्षा जगत के एक दैदीप्यमान नक्षत्र, प्रोफेसर के.एन. पणिक्कर (K.N. Panikkar) का सोमवार को 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे पिछले काफी समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर फैलते ही अकादमिक गलियारों और उनके हजारों शिष्यों के बीच शोक की लहर दौड़ गई। पणिक्कर केवल एक शिक्षक नहीं थे, बल्कि वे उन गिने-चुने विद्वानों में से थे जिन्होंने भारतीय इतिहास को देखने और समझने का एक मौलिक दृष्टिकोण प्रदान किया। उनका जाना भारतीय बौद्धिक संपदा के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
जेएनयू से गहरा नाता: इतिहास विभाग को दी नई ऊंचाई
प्रोफेसर पणिक्कर के करियर का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के साथ बीता। वे वहां न केवल इतिहास विभाग के प्रतिष्ठित प्रोफेसर रहे, बल्कि उन्होंने विभागाध्यक्ष (HOD) के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। जेएनयू के इतिहास विभाग को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में उनकी प्रशासनिक और शैक्षणिक दृष्टि का बड़ा योगदान रहा। उनके सानिध्य में शोध करने वाले छात्र आज देश-दुनिया के बड़े विश्वविद्यालयों में इतिहास की अलख जगा रहे हैं। उन्होंने जेएनयू में एक ऐसी अकादमिक संस्कृति विकसित की, जहां तर्कों और तथ्यों को सर्वोपरि रखा जाता था।
प्रशासनिक अनुभव: श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में योगदान
अकादमिक क्षेत्र के साथ-साथ पणिक्कर ने प्रशासनिक भूमिकाओं में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। वे केरल के कलाडी स्थित श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice-Chancellor) रहे। उनके कार्यकाल के दौरान विश्वविद्यालय ने शोध और नवाचार के क्षेत्र में कई नए आयाम स्थापित किए। उन्होंने संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति के अध्ययन को आधुनिक संदर्भों से जोड़ने का प्रयास किया। केरल की शैक्षिक नीतियों को आकार देने और वहां के उच्च शिक्षा ढांचे को मजबूत करने में उनकी भूमिका को हमेशा याद रखा जाएगा।
लेखन और विचार: औपनिवेशिकता और आधुनिकता पर कालजयी कृतियां
प्रोफेसर पणिक्कर की विद्वत्ता उनकी लिखी किताबों और शोध पत्रों में स्पष्ट झलकती है। उन्होंने विशेष रूप से ‘औपनिवेशिकता’ (Colonialism), ‘आधुनिकता’ (Modernity) और ‘सांस्कृतिक इतिहास’ पर गहन कार्य किया। उनकी रचनाएं औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय समाज में आए वैचारिक परिवर्तनों का सूक्ष्म विश्लेषण करती हैं। उन्होंने अपनी किताबों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया कि किस तरह विदेशी शासन ने भारतीय मानस और संस्कृति को प्रभावित किया। उनकी कृतियां आज भी इतिहास के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ की तरह हैं।
एक धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील सोच के पैरोकार
के.एन. पणिक्कर अपने पूरे जीवन में धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशील मूल्यों के प्रति अडिग रहे। उन्होंने इतिहास के सांप्रदायिकरण के खिलाफ हमेशा मुखर होकर अपनी आवाज उठाई। उनका मानना था कि इतिहास केवल राजाओं और युद्धों की गाथा नहीं है, बल्कि यह आम लोगों के संघर्षों और उनकी चेतना के विकास की कहानी है। उनके विचार आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। सोमवार को उनके पार्थिव शरीर के शांत होने के साथ ही भारतीय इतिहास का एक अध्याय समाप्त हो गया, लेकिन उनके विचार और उनकी किताबें आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी।
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