Health Tips: आज के समय में बच्चों पर उम्र से कई गुना ज्यादा मानसिक प्रेशर हो जाता है, जिससे तमाम तरीके की परेशानी देखने को मिलने लगती है। पढ़ाई का दबाव, परीक्षा में अच्छे अंक लाने की चिंता, सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना और भविष्य को लेकर अनिश्चितता किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में हर सात में से एक किशोर किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित है। ऐसे में एंग्जायटी यानी चिंता से जुड़े संकेतों को समय रहते पहचानना जरूरी है, ताकि बच्चों को सही सहयोग मिल सके।
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किशोरों में एंग्जायटी के लक्षण कैसे दिखाई देते हैं?
एंग्जायटी केवल ज्यादा सोचने या घबराहट महसूस करने तक सीमित नहीं होती। इसका असर शरीर, मन और रोजमर्रा के व्यवहार पर भी पड़ सकता है। कई बार बच्चे अपनी परेशानी खुलकर नहीं बता पाते, इसलिए माता-पिता और शिक्षकों को उनके व्यवहार में होने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए।
शारीरिक संकेतों से भी मिल सकता है चिंता का पता

एंग्जायटी के दौरान कुछ किशोरों को दिल की धड़कन तेज होने, सिरदर्द, चक्कर आने, अधिक पसीना आने या हाथ-पैर कांपने जैसी परेशानियां हो सकती हैं। इसके अलावा सांस लेने में परेशानी, सीने में जकड़न, भूख में बदलाव, मतली, उल्टी, दस्त या कब्ज जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। हालांकि, ये लक्षण दूसरी शारीरिक बीमारियों के कारण भी हो सकते हैं। इसलिए केवल इन संकेतों के आधार पर एंग्जायटी का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। गंभीर या अचानक होने वाली परेशानी में चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।
मानसिक बदलाव भी हो सकते हैं एंग्जायटी के संकेत
लगातार बेचैनी, छोटी-छोटी बातों को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता करना और भविष्य में कुछ गलत होने का डर महसूस करना एंग्जायटी के संभावित संकेत हो सकते हैं। कुछ बच्चों को पढ़ाई में ध्यान लगाने, फैसले लेने या रात में अच्छी नींद लेने में परेशानी होती है। इसके अलावा बार-बार रोने का मन करना, चिड़चिड़ापन, आत्मविश्वास में कमी और किसी पुरानी परेशान करने वाली घटना की याद आना भी मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ने का संकेत हो सकता है। यदि ये बदलाव लंबे समय तक बने रहें और बच्चे की दिनचर्या प्रभावित होने लगे, तो विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।
व्यवहार में बदलाव को भी गंभीरता से लें
एंग्जायटी का असर बच्चों के सामाजिक व्यवहार पर भी दिखाई दे सकता है। बच्चा दोस्तों से मिलना कम कर सकता है, परिवार के साथ समय बिताने से बच सकता है या स्कूल जाने को लेकर लगातार चिंता जाहिर कर सकता है। नई गतिविधियों में हिस्सा लेने से डरना और कुछ परिस्थितियों से बार-बार बचने की कोशिश करना भी ऐसे संकेत हो सकते हैं। माता-पिता को बच्चों की बात ध्यान से सुननी चाहिए और उनकी परेशानियों को छोटी बात समझकर टालने से बचना चाहिए।
भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना है जरूरी
बच्चों को अपनी भावनाएं साझा करने के लिए सुरक्षित माहौल देना चाहिए। माता-पिता, भरोसेमंद दोस्त, शिक्षक या काउंसलर से बातचीत करने से उन्हें अपनी परेशानी समझने और सहायता पाने में मदद मिल सकती है।
नियमित दिनचर्या और शारीरिक गतिविधि अपनाएं
टहलना, दौड़ना, खेलना और तैराकी जैसी गतिविधियां मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक हो सकती हैं। पर्याप्त नींद, संतुलित भोजन और नियमित दिनचर्या भी महत्वपूर्ण हैं। गहरी सांस लेने के अभ्यास और ध्यान से कुछ लोगों को तनाव संभालने में मदद मिल सकती है।
कैफीन और नशीले पदार्थों से दूरी रखें
चाय-कॉफी में मौजूद कैफीन कुछ लोगों में बेचैनी और नींद की समस्या बढ़ा सकता है। किशोरों को शराब, सिगरेट और अन्य नशीले पदार्थों से दूर रहना चाहिए। पढ़ाई और दूसरी जिम्मेदारियों को छोटे हिस्सों में बांटना भी दबाव कम करने में मदद कर सकता है।
कब लें विशेषज्ञ की मदद?
यदि चिंता लगातार बनी रहे, स्कूल, नींद, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगे, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें। समय पर सहयोग और उचित उपचार से किशोरों को अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से संभालने में मदद मिल सकती है।
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