
Haryana News: हरियाणा में लंबे समय से नियमितीकरण का इंतजार कर रहे संविदा और कच्चे कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद राज्य सरकार ने लगभग एक हजार कच्चे कर्मचारियों के दावों पर छह महीने के भीतर विचार कर अंतिम निर्णय लेने के निर्देश जारी किए हैं। हालांकि, स्पष्ट किया गया है कि यह आदेश किसी भी कर्मचारी को स्वतः (ऑटोमैटिक) नियमित करने का आदेश नहीं है, बल्कि प्रत्येक मामले की जांच उसकी पात्रता और लागू नियमों के आधार पर की जाएगी।
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प्रशासनिक विभागों को दिए गए निर्देश

मानव संसाधन विभाग ने राज्य के सभी प्रशासनिक सचिवों, विभागाध्यक्षों, बोर्डों, निगमों, प्राधिकरणों के प्रबंध निदेशकों, मुख्य प्रशासकों, मंडलायुक्तों और उपायुक्तों को हाईकोर्ट के इन आदेशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा है। इसके तहत सभी संबंधित कर्मचारियों को हाईकोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के दो सप्ताह के भीतर अपने संबंधित विभाग में एक विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करना होगा। इस प्रतिवेदन के साथ आदेश की कॉपी भी लगानी अनिवार्य है, जिसमें नियमितीकरण के दावे और उससे जुड़े सभी तथ्यों का स्पष्ट विवरण देना होगा। सरकार ने निर्देश दिए हैं कि मदन सिंह मामले में तय किए गए सिद्धांतों के अनुसार हर एक दावे पर पूरी सावधानी और कारणों के साथ निर्णय लिया जाए।
पात्रता और पुरानी नीतियों के आधार पर तय होंगे दावे

यह पूरा मामला कर्मचारियों द्वारा दायर की गई 151 याचिकाओं से जुड़ा हुआ है, जिसमें सरकार की साल 1996, 2003 और 2014 की नियमितीकरण नीतियों के तहत लाभ की मांग की गई थी। इस मामले में 22 जनवरी 2025 को एकल पीठ ने 1996 की नीति के तहत लाभ देने से तो इनकार कर दिया था, लेकिन 2003 और 2011 की नीतियों के अंतर्गत आने वाले दावों पर छह महीने के भीतर नियमनुसार निर्णय लेने के निर्देश दिए थे।
हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार, जो भी कर्मचारी पात्र पाए जाएंगे, उन्हें याचिका दायर करने की तिथि से बकाया लाभ दिया जा सकता है, हालांकि इस पर किसी प्रकार का ब्याज देय नहीं होगा। इसके अलावा, जो पात्र कर्मचारी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उनकी पेंशन में भी नियमों के अनुसार संशोधन किया जा सकता है। संबंधित संस्था यह जांच करेगी कि कर्मचारी पर 2003 की नीति की शर्तें लागू होती हैं या नहीं। किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कोई प्रतिकूल निर्णय लेने से पहले उसे अपनी बात रखने और सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाएगा। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि जो कर्मचारी पहले से ही नियमित हो चुके हैं, उन्हें इन पुरानी नीतियों का लाभ नहीं मिलेगा।
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