Haryana News: पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के समर्थकों को एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी मामले में बड़ी राहत दी है। हाई कोर्ट ने अगस्त 2017 में हुई हिंसा और आगजनी से जुड़े एक संगीन मामले में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) द्वारा डेरा समर्थकों को बरी किए जाने के फैसले पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है। इसके साथ ही अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली हरियाणा सरकार की अपील को सिरे से खारिज कर दिया।
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हिंसा, तोड़फोड़ और देशद्रोह के आरोप
यह पूरा विवाद साल 2017 में डेरा प्रमुख को सजा सुनाए जाने के बाद भड़की हिंसा से जुड़ा हुआ है।
2017 का घटनाक्रम: अगस्त 2017 में जब साध्वी यौन शोषण मामले में डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को कोर्ट द्वारा दोषी करार दिया गया था, तब हरियाणा के कई जिलों में भारी उपद्रव, हिंसा और आगजनी की घटनाएं सामने आई थीं।
बिजली दफ्तर पर हमला: अभियोजन पक्ष का आरोप था कि 25 अगस्त 2017 को लाठी-डंडों, हथियारों और खतरनाक पेट्रोल बम से लैस डेरा समर्थकों की एक उग्र भीड़ ने कैथल जिले के कलायत में स्थित ‘उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम’ (UHBVN) के कार्यालय पर धावा बोल दिया था।
गंभीर धाराओं में केस: उपद्रवियों ने वहां न केवल भारी तोड़फोड़ की, बल्कि दफ्तर को आग के हवाले भी कर दिया था। इस गंभीर घटना के बाद स्थानीय पुलिस ने नामजद डेरा समर्थकों के खिलाफ देशद्रोह (Sedition), आगजनी, दंगा भड़काने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी बेहद सख्त धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया था।
हाई कोर्ट ने जांच की खामियों पर उठाए सवाल
इस मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट की जस्टिस भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ (डिवीजन बेंच) ने हरियाणा सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के साल 2019 के आदेश को पूरी तरह सही और तार्किक ठहराया।
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि किसी भी आरोपी को केवल संदेह या अनुमान के आधार पर गुनहगार साबित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि सरकारी पक्ष (Prosecution) आरोपियों पर लगाए गए संगीन आरोपों को अदालत के समक्ष कानूनन साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।
अदालत द्वारा रेखांकित की गई मुख्य कमियां
पहचान स्थापित न होना: उपद्रव के समय मौके पर मौजूद कथित आरोपियों की पहचान कानूनी रूप से पुख्ता तरीके से साबित नहीं की जा सकी।
देशद्रोह और आगजनी के प्रमाणों की कमी: देशद्रोह और जानबूझकर आगजनी करने के लिए आवश्यक कानूनी तत्व और दस्तावेजी सबूत कोर्ट के समक्ष पेश नहीं किए जा सके।
गवाहों और फोरेंसिक रिपोर्ट में विरोधाभास: जांच के दौरान गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास पाया गया और मौके से एकत्र किए गए सबूतों की कोई मजबूत फोरेंसिक पुष्टि भी नहीं हो सकी।
इन तमाम जांच खामियों को आधार बनाते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी डेरा समर्थकों—धर्मपाल, जसबीर, शिव कुमार और बलबीर की रिहाई के फैसले को यथावत रखा, जिससे हरियाणा सरकार को इस मामले में बड़ा झटका लगा है।
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