
Haryana News: फतेहाबाद और दिल्ली-एनसीआर के ऐतिहासिक केंद्र सूरजकुंड में इस बार दिवाली के पावन पर्व पर एक विशेष और अनूठे मेले का आयोजन किया जा रहा है। इस दिवाली मेले के उद्घाटन अवसर पर हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी ने प्रदेश और देश की जनता से स्थानीय उत्पादों को बड़े पैमाने पर अपनाने और देश के मेहनतकश कारीगरों को पूरी तरह प्रोत्साहित करने का जोरदार आह्वान किया है। मुख्यमंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि त्योहारों के इस उल्लास भरे माहौल में जब हम खरीदारी करते हैं, तो हमें विदेशी सामान की बजाय अपने देश के पारंपरिक और स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
यह मेला 23 से 26 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है, जिसमें भारतीय हस्तशिल्प, अनूठी लोक संस्कृति, पारंपरिक कलाओं के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों के लजीज खानपान की शानदार झलक देखने को मिल रही है। यह आयोजन शिल्पकारों और आम जनता के बीच सीधा संवाद स्थापित करने का एक बेहतरीन माध्यम बन गया है।
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कारीगरों को सीधा बाजार और उचित मूल्य

मेले के महत्व को रेखांकित करते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि सूरजकुंड दिवाली मेला हमारे स्थानीय कारीगरों, दस्तकारों और शिल्पकारों के उत्पादों को सीधे ग्राहकों तक पहुँचाने का एक बेहद सार्थक और प्रभावी प्रयास है। अक्सर पारंपरिक कारीगरों को बिचौलियों के कारण उनके उत्पादों की सही कीमत नहीं मिल पाती है, लेकिन इस तरह के मंच उन्हें सीधा बाजार उपलब्ध कराते हैं जिससे उन्हें उनके कठिन परिश्रम का उचित और पूरा मूल्य मिल सके। इस प्रकार के आयोजनों से न केवल कारीगरों की कला को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलती है, बल्कि उनके हुनर को एक नया व्यावसायिक आयाम भी प्राप्त होता है।

‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ का संकल्प

त्योहारों के इस सीजन में स्वदेशी उत्पादों को अपनाना केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह हमारे देश के स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता से जुड़ा हुआ विषय है। मुख्यमंत्री ने कहा कि त्योहारों पर स्वदेशी उत्पादों को अपनाकर हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के राष्ट्रीय संकल्प को जमीन पर और अधिक मजबूत बना सकते हैं।
इसके साथ ही, ऐसा करने से हमारे देश के उन लाखों मेहनतकश परिवारों की आजीविका को भी एक मजबूत संबल मिलता है जो पीढ़ियों से अपनी कला और दस्तकारी को जीवित रखे हुए हैं। जब हम स्थानीय दीये, कपड़े, सजावट का सामान या हस्तशिल्प खरीदते हैं, तो हम किसी बड़े कारखाने को नहीं बल्कि किसी हुनरमंद कारीगर के घर में खुशियाँ भेज रहे होते हैं।
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