Harish Rana: हरीश राणा की 13 साल की ‘मौन पीड़ा’ पर बनेगी फिल्म, मुंबई के निर्माता ने दिखाई रुचि

गाजियाबाद के हरीश राणा को 13 साल की असहनीय पीड़ा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 'पैसिव यूथेनेशिया' (इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। इंजीनियरिंग छात्र से बिस्तर पर सिमटने तक का यह सफर अब बॉलीवुड बायोपिक के जरिए पर्दे पर आएगा। जानिए कैसे एक पिता के साहस और न्यायपालिका के फैसले ने देश को झकझोर दिया।

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

मार्च 19, 2026

Harish Rana: गाजियाबाद के राजनगर स्थित राज एम्पायर सोसायटी के निवासी हरीश राणा, जो पिछले 13 वर्षों से ‘कोमा’ जैसी स्थिति में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे, अब अपनी असहनीय पीड़ा से अंतिम विदाई की ओर बढ़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (इच्छामृत्यु) की अनुमति मिलने के बाद, यह मामला न केवल कानूनी गलियारों में बल्कि बॉलीवुड के गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया है।

बायोपिक के जरिए बड़े पर्दे पर दिखेगा हरीश का संघर्ष

हरीश राणा की यह मर्मस्पर्शी कहानी अब सिनेमाई पर्दे पर उतरने को तैयार है। मुंबई के एक प्रसिद्ध लेखक-निर्माता ने हरीश के जीवन, उनके पिता अशोक राणा के साहस और परिवार के 13 वर्षों के लंबे इंतजार पर बायोपिक बनाने की इच्छा जताई है। अधिवक्ता मनीष जैन ने पुष्टि की है कि फिल्म निर्माताओं ने उनसे संपर्क किया है, लेकिन मामले की संवेदनशीलता और हरीश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए अभी प्रतीक्षा करने को कहा गया है। यह फिल्म केवल एक बीमारी की कहानी नहीं, बल्कि न्यायपालिका की संवेदनशीलता का एक जीवंत दस्तावेज होगी।

जीवनरक्षक प्रणालियों को हटाने की प्रक्रिया शुरू

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश के बाद, हरीश को दिल्ली स्थित एम्स (AIIMS) के पैलिएटिव केयर वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया है। अस्पताल के सूत्रों के अनुसार, ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से क्रियान्वित की जा रही है। बुधवार को उन्हें वेंटिलेटर से हटाकर सामान्य बेड पर शिफ्ट किया गया। उनकी फीडिंग ट्यूब को कैप कर दिया गया है और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई है, हालांकि दर्द कम करने के लिए जरूरी दवाएं दी जा रही हैं। मेडिकल बोर्ड को 5 से बढ़ाकर 10 सदस्यों का कर दिया गया है ताकि पूरी प्रक्रिया की निगरानी की जा सके।

वर्ष 2013 की उस काली रात ने बदल दी होनहार छात्र की तकदीर

हरीश राणा के दुर्भाग्य की शुरुआत जुलाई 2010 में हुई थी, जब उन्होंने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया था। अगस्त 2013 में, रक्षाबंधन के दिन अपनी बहन से फोन पर बात करते समय वह पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे ने उन्हें ‘क्वाड्रिप्लेजिया’ (चारों अंगों का लकवा) का शिकार बना दिया। तब से हरीश बिस्तर पर थे, पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर। बेटे की इस हालत को देख पिता अशोक राणा ने अपना तीन मंजिला मकान तक बेच दिया, लेकिन हरीश की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट तक न्याय और गरिमामय मृत्यु की कानूनी लड़ाई

असहनीय शारीरिक कष्ट को देखते हुए माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की गुहार लगाई थी, जिसे 8 जुलाई 2025 को खारिज कर दिया गया था। हार न मानते हुए परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अंततः, 11 मार्च 2026 को देश की शीर्ष अदालत ने हरीश को गरिमामय मृत्यु का अधिकार देते हुए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की अनुमति प्रदान की। यह फैसला समाज में अंगदान और जीवन के अंत के अधिकारों पर एक नई बहस और प्रेरणा लेकर आया है।