Italy PM Fake Video Case : इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हाल ही में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते खतरों को लेकर दुनिया को आगाह किया है। उन्होंने एक्स (X) और फेसबुक पर अपनी बात रखते हुए खुलासा किया कि उनके राजनीतिक विरोधियों ने उनकी अश्लील डीपफेक तस्वीरें साझा कर उन्हें बदनाम करने की कोशिश की है। मेलोनी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि इन तस्वीरों ने उन्हें असलियत से बेहतर दिखाया है, लेकिन उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि अब झूठ फैलाने के लिए किसी भी हद तक गिरा जा सकता है। इस घटना ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि प्रधानमंत्री जैसे सुरक्षित पद पर बैठा व्यक्ति भी सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिकों की निजता का क्या होगा?
क्या है डीपफेक तकनीक और कैसे यह काम करती है?
‘डीपफेक’ तकनीक ‘डीप लर्निंग’ और ‘फेक’ शब्दों के मेल से बनी है। यह एआई का एक उन्नत रूप है जो फोटो, वीडियो और ऑडियो को इतनी सटीकता से बदल देता है कि असली-नकली का भेद करना नामुमकिन हो जाता है। इसमें मुख्य रूप से दो तकनीकों का उपयोग होता है:
- GAN (जनरेटिव एडवर्सरियल नेटवर्क): इसमें दो एआई नेटवर्क आपस में मुकाबला करते हैं। एक नेटवर्क नकली फोटो बनाता है और दूसरा उसे परखता है। जब बनाने वाला नेटवर्क परखने वाले को धोखा देने में सफल हो जाता है, तब वह तस्वीर बिल्कुल असली दिखने लगती है।
- डीप ऑटोएनकोडर: इसमें एआई को किसी व्यक्ति की सैकड़ों तस्वीरों पर प्रशिक्षित किया जाता है ताकि वह किसी दूसरे व्यक्ति के चेहरे के भावों को उस चेहरे पर पूरी तरह फिट कर सके।
डीपफेक का बढ़ता बाजार: अरबों डॉलर का काला कारोबार
रिपोर्ट्स के अनुसार, डीपफेक तकनीक का वैश्विक बाजार 2026 तक 11.18 अरब डॉलर को पार कर जाएगा और 2034 तक इसके 51.42 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। चिंता की बात यह है कि इस तकनीक का इस्तेमाल अपराधों के लिए भी तेजी से बढ़ा है। पिछले तीन वर्षों में डीपफेक आधारित धोखाधड़ी में 2,137% की भारी बढ़ोतरी देखी गई है। यह अनुमान लगाया गया है कि 2026 के अंत तक इंटरनेट पर मौजूद 90% सामग्री एआई द्वारा निर्मित हो सकती है, जो सूचना की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है।
सोशल मीडिया डेटा: आपकी तस्वीरों से कैसे होती है छेड़छाड़?
डीपफेक बनाने के लिए एआई को भारी मात्रा में डेटा की आवश्यकता होती है। हम अपनी जो तस्वीरें फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स पर साझा करते हैं, वही साइबर अपराधियों का हथियार बन जाती हैं। मेलोनी के मामले में भी आरोपियों ने उनके सोशल मीडिया अकाउंट से तस्वीरें लेकर उनसे छेड़छाड़ की। यह स्पष्ट है कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कोई भी डिजिटल सामग्री एआई के लिए ‘चारा’ बन सकती है, जिससे आपकी पहचान और सम्मान को खतरा हो सकता है।
सुरक्षा के अचूक उपाय: खुद को डीपफेक से कैसे बचाएं?
एआई के इस मायाजाल से बचने के लिए सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है। विशेषज्ञों ने निम्नलिखित 5 कदम उठाने की सलाह दी है:
- संदेह करना सीखें: किसी भी संदिग्ध सामग्री को बिना जांचे सच न मानें।
- डिटेक्शन टूल्स का उपयोग: रियलिटी डिफेंडर और डीपवेयर स्कैनर जैसे टूल्स से एआई जनित सामग्री की पहचान करें।
- गूगल का सहारा: ‘अबाउट दिस इमेज’ फीचर से फोटो के मूल स्रोत की जांच करें।
- डिजिटल वॉटरमार्किंग: एआई सामग्री पर वॉटरमार्क लगाने के नियमों का समर्थन करें।
- गोपनीयता बनाए रखें: सोशल मीडिया अकाउंट को प्राइवेट रखें और अपनी निजी तस्वीरें सार्वजनिक रूप से अपलोड करने से बचें।
कानूनी शिकंजा: भारत और इटली में सख्त नियम
डीपफेक के बढ़ते खतरों को देखते हुए इटली ने दोषियों के लिए 5 साल की जेल का कड़ा प्रावधान किया है। भारत भी पीछे नहीं है; फरवरी 2026 में आईटी नियमों में संशोधन कर एआई सामग्री पर लेबलिंग अनिवार्य कर दी गई है। साथ ही, किसी भी गैरकानूनी सामग्री को केवल 3 घंटे के भीतर हटाने का सख्त नियम लागू किया गया है। जैसा कि मेलोनी ने कहा, यह तकनीक किसी को भी गुमराह कर सकती है, इसलिए सामूहिक जागरूकता और कड़े कानून ही एकमात्र समाधान हैं।










