FSSAI Supreme Court: देश में पैकेट बंद खाद्य पदार्थों और जंक फूड्स की बढ़ती खपत के बीच सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) को एक मामले की सुनवाई के दौरान बेहद कड़े शब्दों में फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ तौर पर यह सवाल उठाया है कि क्या FSSAI बड़ी-बड़ी कंपनियों और कॉरपोरेट घरानों के व्यावसायिक दबाव में आकर देश के आम नागरिकों और विशेषकर मासूम बच्चों की सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहा है?
यह पूरा मामला FOPL (फ्रंट ऑफ पैकेट वार्निंग लेबल) यानी पैकेट के ठीक सामने चेतावनी भरे लेबल या निशान लगाने से जुड़ा हुआ है। गौरतलब है कि इस साल फरवरी में भी सर्वोच्च न्यायालय ने पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट चेतावनी लिखने को लेकर कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए थे। अदालत का मानना था कि पैकेट पर चेतावनी का निशान देखकर आम उपभोक्ता सामान खरीदते समय जागरूक हो सकेगा और सेहतमंद विकल्पों का चुनाव कर पाएगा, लेकिन इस दिशा में लगातार हो रही देरी ने अदालत को नाराज कर दिया है।
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FSSAI का तर्क और सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसकी खारिज प्रक्रिया
बीते गुरुवार को हुई इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान FSSAI की ओर से अदालत में पक्ष रखा गया कि उन्होंने इस विषय पर विभिन्न कंपनियों और संबंधित पक्षों के साथ चर्चा की है। FSSAI का यह तर्क था कि पैकेट पर लाल रंग का निशान या सीधी चेतावनी देखकर उपभोक्ता डर सकते हैं। इसके विकल्प के रूप में FSSAI ने सुझाव दिया कि चेतावनी के स्थान पर पैकेट पर एक छोटा चार्ट या न्यूट्रिशनल टेबल दी जानी चाहिए, जिसमें भारतीय मानकों के अनुसार दिनभर की सेवन सीमा का जिक्र हो।
जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने FSSAI के इस सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि FSSAI यह उम्मीद कर रहा है कि ग्राहक दुकान पर खड़े-खड़े गणित लगाए कि उसे दिनभर में कितनी चीनी, फैट या नमक का सेवन करना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के जटिल चार्ट से चेतावनी देने का मूल उद्देश्य और जन-जागरूकता का मकसद पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
पारंपरिक स्नैक्स का तर्क और बच्चों के स्वास्थ्य पर चिंता
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकील की तरफ से यह दलील दी गई कि पश्चिमी देशों के नियम और फॉर्मेट सीधे तौर पर भारत में लागू नहीं किए जा सकते, क्योंकि भारत के अपने पारंपरिक स्नैक्स, नमकीन और मिठाइयां हैं और इस आदेश से उन पर भी लाल चेतावनी का निशान लग जाएगा।
न्यायाधीशों ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए जनहित को सर्वोपरि रखा। जस्टिस पारडीवाला ने गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि आज के समय में देश के बच्चे पैकेट बंद खाना और जंक फूड अत्यधिक मात्रा में खा रहे हैं, जिसके चलते उन्हें जागरूक करना और उनके स्वास्थ्य की रक्षा करना आज की सबसे बड़ी और प्राथमिक आवश्यकता है।
कोर्ट की दो टूक चेतावनी और दो हफ्ते का समय
सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI के सुस्त और ढीले रवैये पर कड़ा रोष व्यक्त करते हुए कहा कि कॉरपोरेट कंपनियों का मुनाफा या नुकसान कभी भी देश के आम नागरिकों की सेहत और जीवन से बड़ा नहीं हो सकता।
सुनवाई के अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने FSSAI को अपने रुख और फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए दो सप्ताह का सख्त समय दिया है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि FSSAI खुद इस मामले में कोई सही और जनहितैषी कड़ा फैसला नहीं ले पाता है, तो सुप्रीम कोर्ट स्वयं अपनी तरफ से इस पर सख्त आदेश जारी करेगा। इस हाई-प्रोफाइल कानूनी हस्तक्षेप के बाद अब खाद्य नियामक और बड़ी फूड कंपनियों की नींद उड़नी तय मानी जा रही है।
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