
France Protest : फ्रांस में बढ़ती महंगाई, जीवनयापन की लागत और सरकार की नीतियों के खिलाफ लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी असंतोष के बीच शनिवार को देश के कई शहरों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। राजधानी पेरिस समेत कई प्रमुख शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं। हालात बिगड़ने पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए देशभर में 565 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान चार पुलिसकर्मियों के घायल होने की भी जानकारी सामने आई है।
पेरिस से लियोँ तक पुलिस ने छोड़े आंसू गैस के गोले
शनिवार को दोपहर तक ज्यादातर शहरों में प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से चल रहे थे। हालांकि, शाम होते-होते हालात बदलने लगे। पेरिस में मार्च के अंतिम चरण में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए अभियान चलाया। वहीं लियोँ और तुलूज में पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े। मार्सेई में भी प्रदर्शन के अंतिम समय में तनाव बढ़ गया था, लेकिन रात होने तक स्थिति काफी हद तक सामान्य हो गई। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी।
लगातार तीसरे सप्ताह जारी रहा विरोध प्रदर्शन
फ्रांस में यह लगातार तीसरा सप्ताह है, जब लोग सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे पहले 17 अक्टूबर को देश के कई हिस्सों में दंगे और लूटपाट की घटनाएं सामने आई थीं। उस दौरान दुकानों, सरकारी इमारतों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की गई थी। हालांकि, इस शनिवार को पिछले दो सप्ताह की तुलना में प्रदर्शनकारियों की संख्या कम रही। फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक, देशभर में करीब 3 लाख 20 हजार लोगों ने विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।
गृह मंत्री ने दी सख्त कार्रवाई की चेतावनी, 565 लोग गिरफ्तार
फ्रांस के गृह मंत्री लॉरां नुनेज ने प्रदर्शन के दौरान हिंसा की आशंका को लेकर पुलिस को सतर्क रहने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि जो लोग शनिवार रात संघर्ष या हिंसा में शामिल होना चाहते हैं, उनसे सख्ती से निपटा जाएगा। गृह मंत्री के मुताबिक, देश के अलग-अलग शहरों में हुई कार्रवाई के दौरान 565 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस दौरान चार पुलिस अधिकारी घायल हुए। सरकार ने साफ किया है कि कानून-व्यवस्था बिगाड़ने वालों के खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएंगे।
महंगाई और सरकार की नीतियों से नाराज हैं आम नागरिक
हैलोवीन उत्सव के बीच हुए इन प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में युवा और आम नागरिक शामिल हुए। पेरिस में प्रदर्शन कर रहे जेरोम रोड्रिगेज ने सरकार की आर्थिक नीतियों पर नाराजगी जताई। उनका कहना था कि देश की अर्थव्यवस्था खराब स्थिति में है और सरकार आम लोगों की परेशानियों को समझने में नाकाम रही है। उन्होंने कहा कि जहां सरकार करोड़ों यूरो के बजट और आर्थिक आंकड़ों में उलझी है, वहीं सामान्य परिवार छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

छात्रों से शुरू हुआ आंदोलन, मजदूर और येलो वेस्ट भी हुए शामिल
फ्रांस में इस विरोध आंदोलन की शुरुआत शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर हुई थी। छात्रों ने स्कूलों में शिक्षकों और संसाधनों की कमी, कक्षाओं में अधिक विद्यार्थियों की संख्या और विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया के खिलाफ आवाज उठाई थी। धीरे-धीरे इस आंदोलन में मजदूर संगठनों ने भी हिस्सा लेना शुरू कर दिया। इसके बाद जीवनयापन की बढ़ती लागत के खिलाफ पहले सक्रिय रहा ‘येलो वेस्ट’ आंदोलन भी दोबारा मजबूत होने लगा। अब यह विरोध केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि महंगाई, आर्थिक असमानता और सरकार की नीतियों के खिलाफ व्यापक आंदोलन बन गया है।
आर्थिक संकट के बीच माखों सरकार पर बढ़ा दबाव
फ्रांस में बढ़ती राजनीतिक और सामाजिक अशांति ऐसे समय सामने आई है, जब राष्ट्रपति इमैनुएल माखों की सरकार पहले से आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही है। शुक्रवार को रेटिंग एजेंसी फिच ने फ्रांस के ऋण परिदृश्य को अप्रत्याशित रूप से नकारात्मक कर दिया। इससे देश की वित्तीय स्थिति को लेकर निवेशकों की चिंताएं और बढ़ गई हैं। फ्रांस का सरकारी कर्ज सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के लगभग 120 प्रतिशत के करीब पहुंच चुका है। साथ ही कर्ज लेने की लागत भी बढ़ रही है। ऐसे में सरकार पर सरकारी खर्च घटाने का दबाव बढ़ गया है।
जर्मनी और इटली तक पहुंची विरोध की लहर
फ्रांस में जारी आंदोलन का असर यूरोप के दूसरे देशों में भी दिखाई देने लगा है। जर्मनी के कई शहरों और इटली में भी लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए। जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में कुछ नकाबपोश प्रदर्शनकारियों द्वारा दुकानों में लूटपाट किए जाने की खबरें सामने आईं। यूरोप के कई देशों में युवा और जेन-जी समूह आर्थिक असमानता, महंगाई और सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। ऐसे में फ्रांस का आंदोलन अब केवल घरेलू राजनीतिक चुनौती नहीं रह गया है, बल्कि यूरोप में बढ़ते सामाजिक असंतोष का संकेत भी माना जा रहा है।
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