End of Left Rule India : केरल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना के शुरुआती रुझानों ने भारतीय राजनीति में एक नए युग की आहट दे दी है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) ने राज्य में निर्णायक बढ़त बना ली है। यह जीत केवल एक राज्य की सत्ता का परिवर्तन नहीं है, बल्कि देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि भारत के किसी भी राज्य में अब लेफ्ट (वामपंथी) सरकार अस्तित्व में नहीं रहेगी। केरल वह अंतिम किला था जहां लाल झंडा लहरा रहा था, लेकिन अब यह गढ़ भी वामपंथ के हाथ से फिसलता नजर आ रहा है। यह घटनाक्रम भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति के लिए एक बड़े युग के अंत जैसा है।
बंगाल और त्रिपुरा के बाद केरल में भी ढहा लाल किला
वामपंथी राजनीति का पतन पिछले डेढ़ दशक से जारी है। साल 2011 में पश्चिम बंगाल में दशकों पुराने लेफ्ट शासन का अंत हुआ था, जिसके बाद वामपंथी दल वहां दोबारा वापसी नहीं कर सके। इसके बाद 2018 में त्रिपुरा की जनता ने भी लेफ्ट को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। अब 2026 में केरल के नतीजों ने इस सिलसिले को पूरा कर दिया है। यूडीएफ की इस संभावित जीत के साथ ही पूरे देश से वामपंथी सरकारों का सफाया हो गया है। अब भारत के किसी भी कोने में वामपंथ सत्ता के शीर्ष पर काबिज नहीं है, जो निश्चित रूप से राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को बदल कर रख देगा।
रुझानों में यूडीएफ का दबदबा: 100 सीटों के पार जाने का दावा
केरल की 140 विधानसभा सीटों के शुरुआती रुझानों पर गौर करें तो यूडीएफ फिलहाल 90 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। वहीं, सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) महज 40 सीटों के आसपास सिमटता दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला एनडीए (NDA) भी 5 सीटों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता नजर आ रहा है। केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख सनी जोसेफ ने इन रुझानों पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि यह जनता के स्पष्ट जनादेश का संकेत है। उन्होंने पूर्ण विश्वास व्यक्त किया है कि अंतिम परिणाम आने तक यूडीएफ आसानी से 100 सीटों का जादुई आंकड़ा पार कर लेगा।
मुख्यमंत्री विजयन सहित 12 मंत्रियों की सीट पर बढ़ा संकट
इस चुनाव की सबसे चौंकाने वाली खबर यह है कि एलडीएफ सरकार के दिग्गज अपनी साख बचाने में संघर्ष कर रहे हैं। मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन अपनी पारंपरिक और सुरक्षित माने जाने वाली सीट ‘धर्मदम’ में पिछड़ रहे हैं। उनके अलावा मंत्रिमंडल के 12 प्रमुख मंत्री भी अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पीछे चल रहे हैं। पिछड़ने वाले मंत्रियों में वीना जॉर्ज, एम बी राजेश, पी राजीव और वी शिवनकुट्टी जैसे बड़े नाम शामिल हैं। मंत्रियों का इस तरह पिछड़ना साफ तौर पर राज्य में चल रही सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) और बदलाव की मांग को दर्शाता है।
केरल में बदलाव की बयार और कांग्रेस का पुनरुद्धार
केरल का यह चुनाव परिणाम कांग्रेस पार्टी के लिए संजीवनी के समान है। यूडीएफ की इस जीत ने साबित कर दिया है कि केरल की जनता ने एक बार फिर कांग्रेस की नीतियों पर भरोसा जताया है। वामपंथी मोर्चे के मंत्रियों और खुद मुख्यमंत्री के पिछड़ने से यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और आर्थिक नीतियों को लेकर जनता में गहरा असंतोष था। दोपहर तक स्थिति और भी साफ हो जाएगी, लेकिन वर्तमान रुझान यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि केरल अब एक नए राजनीतिक नेतृत्व की ओर कदम बढ़ा चुका है और देश के राजनीतिक पटल से ‘लाल सितारा’ ओझल हो रहा है।










