Elvish Yadav Case: एल्विश यादव को बड़ी राहत, सुप्रीम कोर्ट ने सांप के जहर केस में FIR की रद्द

यूट्यूबर एल्विश यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने सांप के जहर के इस्तेमाल और एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। बेंच ने माना कि बरामद पदार्थ कानून के दायरे में नहीं था और शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया में तकनीकी खामियां थीं। जानिए इस बड़े फैसले के पीछे के मुख्य कानूनी कारण।

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

मार्च 19, 2026

Elvish Yadav Case: मशहूर यूट्यूबर और बिग बॉस ओटीटी विजेता एल्विश यादव के लिए कानूनी मोर्चे पर एक बड़ी जीत सामने आई है। उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने उनके खिलाफ दर्ज उस आपराधिक मामले को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसमें उन पर रेव पार्टियों में सांप के जहर के इस्तेमाल और ड्रग्स सप्लाई करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि मौजूदा एफआईआर कानूनी मापदंडों पर खरी नहीं उतरती और इसे जारी रखना न्यायसंगत नहीं है।

एनडीपीएस एक्ट की धाराएं और कानूनी वैधता पर सवाल

अदालत ने अपनी सुनवाई के दौरान मुख्य रूप से दो तकनीकी पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया। पहला सवाल नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 (NDPS Act) की धारा 2(23) की प्रासंगिकता पर था। वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने दलील दी कि जिस पदार्थ को पुलिस ने बरामद किया था, वह ड्रग्स की श्रेणी में नहीं बल्कि सांप के जहर का ‘एंटीडोट’ था। बेंच ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए माना कि यह पदार्थ एनडीपीएस एक्ट की वैधानिक अनुसूची (Statutory Schedule) का हिस्सा नहीं है, इसलिए इस कानून के तहत मामला बनाना गलत था।

एल्विश यादव से कोई बरामदगी नहीं और साक्ष्यों का अभाव

मामले की गहराई में जाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि एल्विश यादव के पास से व्यक्तिगत रूप से किसी भी प्रकार की प्रतिबंधित सामग्री या सांप का जहर बरामद नहीं हुआ था। चार्जशीट में केवल इस बात का जिक्र था कि उन्होंने किसी सहयोगी के जरिए ऑर्डर दिए थे। कोर्ट ने पाया कि बिना किसी ठोस बरामदगी और एनडीपीएस एक्ट के दायरे से बाहर के पदार्थों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही चलाना कानून की दृष्टि से उचित नहीं है।

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की धारा 55

दूसरे महत्वपूर्ण बिंदु पर चर्चा करते हुए अदालत ने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 55 का उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस कानून के तहत कोई भी मुकदमा तभी शुरू किया जा सकता है जब शिकायत किसी विधिवत अधिकृत सरकारी अधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई हो। इस मामले में शिकायत ‘पीपल फॉर एनिमल्स’ (PFA) के गौरव गुप्ता द्वारा की गई थी। अदालत ने माना कि निजी संस्था की शिकायत के आधार पर पुलिस की यह कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन थी।

सक्षम प्राधिकारी की अनुपस्थिति और एफआईआर का भविष्य

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में शिकायतकर्ता की मंशा और कानूनी प्रक्रिया पर भी गौर किया। बेंच ने कहा कि एफआईआर अपने वर्तमान स्वरूप में सुनवाई के योग्य नहीं थी क्योंकि इसे दर्ज कराने के लिए जिस ‘सक्षम प्राधिकारी’ की आवश्यकता होती है, वह इस प्रक्रिया में शामिल नहीं था। कोर्ट के अनुसार, भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत लगाए गए अन्य आरोप भी स्वतंत्र रूप से नहीं टिक सकते थे क्योंकि वे उसी पुरानी शिकायत पर आधारित थे जिसे रद्द करने की प्रक्रिया चल रही थी।

अदालत का अंतिम फैसला और जांच की मेरिट

अंततः, उच्चतम न्यायालय ने एल्विश यादव के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करने का आदेश दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि यह फैसला केवल कानूनी प्रक्रियाओं और तकनीकी खामियों के आधार पर लिया गया है। कोर्ट ने मूल आरोपों की मेरिट या गहराई से जांच नहीं की है, बल्कि इसे प्रक्रियात्मक आधार पर अवैध माना है। इस फैसले के बाद एल्विश यादव के समर्थकों और सोशल मीडिया पर इस केस को लेकर चल रही चर्चाओं को एक नया मोड़ मिल गया है।`