
DPDP Act India : भारत के 21 प्रमुख डिजिटल समाचार प्रकाशकों के संगठन डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने केंद्र सरकार के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, संगठन ने 698 पन्नों की याचिका में आशंका जताई है कि इस कानून से स्वतंत्र और खोजी पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है। DNPA का कहना है कि इसके कुछ प्रावधान पत्रकारों के कामकाज, समाचारों की जांच और गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।
बड़े मीडिया समूह शामिल
इस कानूनी चुनौती में देश के कई प्रमुख मीडिया संस्थानों से जुड़े प्रकाशक शामिल हैं। इनमें मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले कारोबारी समूह से जुड़ा नेटवर्क18, गौतम अडानी समूह से जुड़ा एनडीटीवी, द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे नाम शामिल बताए गए हैं। इस मामले ने डिजिटल मीडिया, व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। याचिका में कानून के उन पहलुओं पर सवाल उठाए गए हैं, जिनका असर समाचार जुटाने और प्रकाशित करने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।

सहमति की अनिवार्यता से खोजी पत्रकारिता प्रभावित होने की आशंका
DNPA की प्रमुख चिंता व्यक्तिगत डेटा एकत्र करने के लिए सहमति से जुड़े नियमों को लेकर है। संगठन का तर्क है कि यदि पत्रकारों को किसी व्यक्ति से जुड़ी जानकारी जुटाने से पहले उसकी अनुमति लेनी पड़े, तो घोटालों और भ्रष्टाचार की जांच प्रभावित हो सकती है। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति सबूत नष्ट कर सकता है या गवाहों पर दबाव डाल सकता है। संगठन के मुताबिक, खोजी पत्रकारिता में कई बार ऐसी जानकारी सामने लानी पड़ती है, जिसे संबंधित पक्ष सार्वजनिक नहीं करना चाहता।
प्रकाशित खबरें हटाने के अधिकार पर भी सवाल
याचिका में व्यक्तिगत डेटा मिटाने और सहमति वापस लेने से जुड़े प्रावधानों को लेकर भी चिंता जताई गई है। DNPA का कहना है कि सार्वजनिक हित में प्रकाशित खबरों के मामले में स्पष्ट छूट नहीं होने से मीडिया संस्थानों पर सामग्री हटाने या उसमें बदलाव करने का दबाव बन सकता है। इससे पुरानी खबरों, भ्रष्टाचार से जुड़े खुलासों और सार्वजनिक महत्व की रिपोर्टों की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका है। संगठन ने इस विषय पर स्पष्ट कानूनी सुरक्षा की जरूरत बताई है।


पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के लिए स्पष्ट छूट की मांग
DNPA ने तर्क दिया है कि यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों के डेटा संरक्षण ढांचों में पत्रकारिता के लिए विशेष प्रावधान मौजूद हैं। संगठन के मुताबिक, भारत में भी खोजी पत्रकारिता और जनहित में की जाने वाली रिपोर्टिंग के लिए स्पष्ट लिखित छूट जरूरी है। याचिका में कहा गया है कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं है, क्योंकि मीडिया संस्थानों को कानून के दायरे और संभावित दंड को लेकर स्पष्टता चाहिए।
गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा और सेंसरशिप का मुद्दा
संगठन ने यह आशंका भी जताई है कि सरकारी एजेंसियों को डेटा मांगने की व्यापक शक्तियां मिलने से पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों की पहचान खतरे में पड़ सकती है। इससे भ्रष्टाचार या अनियमितताओं का खुलासा करने वाले व्हिसलब्लोअर्स आगे आने से हिचक सकते हैं। इसके अलावा, कथित गैर-अनुपालन पर भारी जुर्माने और जानकारी तक पहुंच रोकने संबंधी शक्तियों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। DNPA ने इन प्रावधानों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए संभावित खतरा बताया है।
डिजिटल गोपनीयता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन
इस मामले का मूल सवाल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा है। एक ओर नागरिकों की निजता की रक्षा महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक हित में तथ्य उजागर करने वाली पत्रकारिता भी लोकतंत्र का अहम हिस्सा है। अब सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर होने वाली कार्यवाही पर मीडिया जगत की नजर रहेगी। याचिका में उठाई गई चिंताओं और सरकार के पक्ष पर आगे की कानूनी प्रक्रिया में स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
Read More : Cyclone Arnab: बेहद गंभीर चक्रवाती तूफान में बदला अर्नब, आंध्र प्रदेश के तट पर खतरा











