DK Shivakumar Journey : जेल यात्रा से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक, क्या है डीके शिवकुमार की इनसाइड स्टोरी ?

कर्नाटक के कनकपुरा से 8 बार के विधायक और कांग्रेस के सबसे बड़े संकटमोचक डीके शिवकुमार का सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। ईडी की कस्टडी और तिहाड़ जेल की सलाखों से लेकर राज्य के सर्वोच्च राजनीतिक शिखर तक पहुंचने की इस रहस्यमयी और संघर्षपूर्ण दास्तान के पीछे कौन से समीकरण छिपे हैं?

DK Shivakumar Journey

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मई 28, 2026

DK Shivakumar Journey :  कर्नाटक की राजनीति से इस समय की सबसे बड़ी और धमाकेदार खबर सामने आ रही है। कांग्रेस के कद्दावर नेता और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार जिस पल का पिछले लंबे समय से बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, वह ऐतिहासिक घड़ी आखिरकार 28 मई को आ ही गई। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद से इस्तीफा देने की आधिकारिक घोषणा कर दी है। उनके इस बड़े फैसले और इस्तीफे के बाद अब कर्नाटक की सत्ता की कमान पूरी तरह से डीके शिवकुमार के हाथों में सौंपी जाएगी।

कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय संकटमोचक माने जाने वाले डीके शिaवकुमार अब कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। गौरतलब है कि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार के सफल तीन साल पूरे हो चुके हैं, जिसके कारण अब ‘पावर शेयरिंग’ फॉर्मूले के तहत डीके शिवकुमार के पास मुख्यमंत्री के तौर पर काम करने के लिए केवल दो साल का समय बचेगा। आइए इस बड़े सियासी उलटफेर के बीच नजर डालते हैं डीके शिवकुमार के अब तक के शानदार और उतार-चढ़ाव से भरे राजनीतिक सफर पर कि कैसे एक सामान्य छात्र नेता आज सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने में कामयाब रहा।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ चार दशकों का लंबा सियासी सफर

डीके शिवकुमार का राजनीतिक जीवन बेहद समृद्ध रहा है और इसका इतिहास करीब चार दशक पुराना है। उनके सियासी सफर की शुरुआत किसी बड़े पद से नहीं, बल्कि एक बेहद जमीनी छात्र नेता के रूप में हुई थी। अपनी कड़ी मेहनत, बेजोड़ सांगठनिक क्षमता और आक्रामक राजनीति के दम पर आज वे कर्नाटक में कांग्रेस के सबसे बड़े, कद्दावर और आर्थिक रूप से मजबूत नेताओं में शुमार हो चुके हैं। हालांकि डीके शिवकुमार का परिवार पहले से ही स्थानीय राजनीति में थोड़ा-बहुत सक्रिय था, लेकिन उन्होंने खुद को पूरी तरह राजनीति में तब झोंका जब वे महज 18 साल के थे। इतनी छोटी उम्र में वे कांग्रेस के छात्र संगठन भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) से औपचारिक रूप से जुड़ गए थे।

जब 23 साल की उम्र में देश के दिग्गज नेता देवेगौड़ा को दी चुनौती

अपने जुझारू स्वभाव के कारण डीके शिवकुमार बहुत जल्द संगठन की सीढ़ियां चढ़ते गए। साल 1981 से लेकर 1983 के बीच उन्हें बेंगलुरु में एनएसयूआई (NSUI) का जिला अध्यक्ष बनाया गया। बेंगलुरु के आरसी कॉलेज में अपनी उच्च शिक्षा की पढ़ाई करने के दौरान ही वे युवा कांग्रेस (यूथ कांग्रेस) की मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हो गए और जल्द ही उन्हें कर्नाटक स्टेट यूथ कांग्रेस का महासचिव नियुक्त कर दिया गया। उनकी लोकप्रियता और आक्रामकता को देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने उन्हें मात्र 23 साल की उम्र में सथानूर विधानसभा सीट से अपना पहला चुनावी उम्मीदवार बना दिया। उस समय उनका सीधा मुकाबला सूबे के सबसे कद्दावर नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा से था।

सथानूर सीट से दर्ज की पहली जीत और पहुंचे विधानसभा

यद्यपि अपने जीवन के उस पहले बेहद चुनौतीपूर्ण विधानसभा चुनाव में डीके शिवकुमार को हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन देश के इतने बड़े दिग्गज नेता के सामने उनके बेहद मजबूत और आक्रामक प्रदर्शन ने दिल्ली तक कांग्रेस के आलाकमान को गहराई से प्रभावित किया। इस हार से निराश हुए बिना वे जमीन पर डटे रहे और साल 1987 में उन्हें राजनीति की पहली बड़ी सफलता मिली, जब उन्होंने सथानूर इलाके से जिला पंचायत का चुनाव शानदार बहुमत से जीता। इसके ठीक दो साल बाद यानी 1989 में उनका विधायक बनने का सपना सच हुआ। उन्होंने सथानूर विधानसभा सीट से ही कांग्रेस के आधिकारिक टिकट पर पहली बार चुनाव जीता और एक कड़े मुकाबले में जीत दर्ज कर पहली बार बतौर विधायक कर्नाटक विधानसभा की दहलीज पर कदम रखा।

नब्बे के दशक में सूबे के सबसे युवा मंत्री बने डीके शिवकुमार

1990 के दशक की शुरुआत होते-होते डीके शिवकुमार कर्नाटक की प्रांतीय सियासत में बहुत तेजी से उभरे और एक बड़े रणनीतिकार के रूप में अपनी धाक जमाई। उन्होंने तत्कालीन एस. बंगारप्पा सरकार को सत्ता में लाने और उसे मजबूती से चलाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दौरान वे बंगारप्पा कैबिनेट का हिस्सा बने और उस दौर में वे कर्नाटक सरकार के सबसे युवा मंत्रियों में से एक गिने जाते थे। हालांकि साल 1994 में उनके राजनीतिक जीवन में एक बड़ा मोड़ आया, जब पार्टी के भीतर कुछ आंतरिक कलह के कारण कांग्रेस ने उन्हें टिकट देने से साफ इनकार कर दिया। लेकिन हार न मानने वाले शिवकुमार ने पार्टी से बगावत कर दी और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतर गए। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि वे उस कठिन परिस्थिति में भी निर्दलीय चुनाव जीतकर वापस विधानसभा पहुंचे।

कनकपुरा और सथानूर से लगातार जीत ने बनाया बड़ा लीडर

निर्दलीय चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस को भी उनकी ताकत का अहसास हुआ और उनकी ससम्मान पार्टी में वापसी हुई। इसके बाद उन्होंने सथानूर और बाद में कनकपुरा विधानसभा सीट से लगातार कई ऐतिहासिक चुनाव जीते और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा के बेहद करीबी और भरोसेमंद होने के कारण उन्हें सरकार में बिजली मंत्रालय और शहरी विकास जैसे कई बेहद महत्वपूर्ण और भारी-भरकम विभागों की जिम्मेदारी सौंपी गई। इन मंत्रालयों में उनके बेहतरीन काम और कड़े फैसलों के बाद पूरी कांग्रेस पार्टी उन्हें एक कुशल रणनीतिकार और बेहद कद्दावर नेता के रूप में देखने लगी।

चुनावी मैनेजर से लेकर कांग्रेस के सबसे बड़े ‘संकटमोचक’ बनने की कहानी

अगले कुछ ही वर्षों के भीतर डीके शिवकुमार पूरे कर्नाटक राज्य में कांग्रेस पार्टी के सबसे भरोसेमंद और ‘वन मैन आर्मी’ जैसे नेता बनकर उभरे। उनका राजनीतिक प्रभाव सिर्फ अपने क्षेत्र में चुनाव जीतने तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे राज्य में फैला हुआ था। कांग्रेस आलाकमान जब भी किसी राज्य में या केंद्र में किसी बड़ी राजनीतिक मुसीबत में फंसता था, तो डीके शिवकुमार को ही याद किया जाता था। वे धीरे-धीरे पार्टी के एक कुशल चुनावी मैनेजर और रिसोर्स मैन की भूमिका निभाने लगे। चुनाव जीतने की अचूक रणनीति तैयार करने से लेकर, संकट के समय या रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के दौरान पार्टी के विधायकों को एकजुट रखने और उन्हें टूटने से बचाने की बेहद जटिल जिम्मेदारी भी आलाकमान आंख मूंदकर केवल डीके शिवकुमार को ही सौंपने लगा। यही वजह है कि उन्हें कांग्रेस का आधिकारिक ‘संकटमोचक’ कहा जाने लगा।

केंद्रीय एजेंसियों की जांच

साल 2017 के गुजरात राज्यसभा चुनाव के दौरान जब अहमद पटेल की सीट खतरे में थी, तब बीजेपी के कथित ऑपरेशनों से बचाकर गुजरात के कांग्रेस विधायकों को बेंगलुरु के रिजॉर्ट में सुरक्षित रखने में डीके ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी। इसी के बाद वे केंद्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर आ गए। साल 2017 में उनके ठिकानों पर इनकम टैक्स (IT) के बड़े छापे पड़े और साल 2019 में मनी लॉन्ड्रिंग के एक कथित मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, जिसके कारण उन्हें कई दिनों तक तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे भी रहना पड़ा।

लेकिन वे टूटे नहीं; जेल से रिहा होने के बाद मार्च 2020 में उन्हें कर्नाटक कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने पूरे राज्य का दौरा कर बिखर चुकी पार्टी को फिर से पैरों पर खड़ा किया और आखिरकार साल 2023 के विधानसभा चुनाव में सिद्धारमैया के साथ मिलकर कर्नाटक में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत से ऐतिहासिक जीत दिलाई। इसी अटूट संघर्ष और वफादारी का इनाम आज उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी के रूप में मिलने जा रहा है।

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