Dhar Bhojshala Case: मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने राज्य प्रशासन से कहा है कि शुक्रवार की नमाज़ के लिए विवादित परिसर के समीप एक उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम समुदाय को खसरा नंबर 596 की उस भूमि पर, जिसे दरगाह की भूमि बताया गया है, प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज़ अदा करने की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह स्थान विवादित परिसर के निकट है और फिलहाल उपयुक्त प्रतीत होता है।
वैकल्पिक व्यवस्था पर भी अदालत ने रखा विकल्प
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि दोनों पक्ष आपसी सहमति से किसी अन्य स्थान को अधिक उपयुक्त मानते हैं, तो वे वैकल्पिक व्यवस्था कर सकते हैं। अदालत का यह निर्देश किसी भी पक्ष को आपसी सहमति से नया स्थान चुनने से नहीं रोकता। सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अनुरोध किया कि साइट प्लान में “दरगाह भूमि” के रूप में चिह्नित क्षेत्र को शुक्रवार की नमाज़ के लिए विचार में लिया जाए। अदालत ने इस अनुरोध पर विचार करते हुए अंतरिम व्यवस्था का आदेश दिया।
राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार दो समुदायों के बीच अधिकारों के विवाद में पक्षकार नहीं बनना चाहती और उसका मुख्य उद्देश्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य की जिम्मेदारी केवल शांति बनाए रखने तक सीमित नहीं है। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक के धार्मिक अधिकारों की रक्षा करना भी राज्य सरकार का दायित्व है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासन को दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाते हुए संवैधानिक जिम्मेदारियों का पालन करना होगा।
कैसे बढ़ा भोजशाला विवाद
भोजशाला को लेकर विवाद कई दशकों से चला आ रहा है, लेकिन वर्ष 1990 के बाद इस मामले ने अधिक संवेदनशील रूप ले लिया। वर्ष 1995 के बाद हिंदू संगठनों ने इस स्थल को मां सरस्वती का मंदिर घोषित करने की मांग तेज कर दी, जबकि मुस्लिम समुदाय ने इसे कमाल मौला मस्जिद बताते हुए अपना दावा बरकरार रखा। इसके बाद प्रशासन ने दोनों पक्षों के धार्मिक कार्यक्रमों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग दिनों की व्यवस्था बनाई। एक समय मंगलवार को हिंदू समुदाय को पूजा की अनुमति दी गई, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज़ अदा करने की अनुमति दी गई।
प्रशासनिक फैसलों से बदलती रही व्यवस्था
भोजशाला परिसर में प्रवेश और धार्मिक गतिविधियों को लेकर समय-समय पर प्रशासन ने कई निर्णय लिए। 12 मई 1997 को आम नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके बाद 6 फरवरी 1998 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने परिसर में प्रवेश को लेकर नई व्यवस्था लागू की। बाद में वर्ष 2003 में प्रशासन ने फिर से मंगलवार को हिंदू समुदाय को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज़ की अनुमति देने की व्यवस्था लागू की। इन फैसलों का उद्देश्य दोनों समुदायों के बीच संतुलन बनाए रखना था, हालांकि विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका।
हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
इंदौर संभाग से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित धार की भोजशाला का इतिहास करीब 800 वर्ष पुराना माना जाता है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर बताते हुए विभिन्न ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों का हवाला देता रहा है। वहीं मुस्लिम पक्ष इस स्थल को कमाल मौला मस्जिद मानते हुए अपने धार्मिक अधिकारों का दावा करता है। वर्षों से प्रशासन दोनों समुदायों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता रहा है, लेकिन विवाद लगातार न्यायालयों तक पहुंचता रहा। पहले यह मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में विचाराधीन रहा और अब सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई जारी है। शीर्ष अदालत के ताजा निर्देश के बाद प्रशासन को अंतरिम व्यवस्था लागू करनी होगी, जबकि मामले के अंतिम कानूनी समाधान पर सभी पक्षों की निगाहें बनी हुई हैं।










