Ram Janmabhoomi Donation Case: देश के सुप्रसिद्ध और प्रख्यात कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने अयोध्या राम मंदिर दान पात्र विवाद और इस मामले में SIT (विशेष जांच दल) के गठन को लेकर गहरा दुख और आक्रोश व्यक्त किया है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मीडिया से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आज़ाद भारत के इतिहास में इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और दुखी करने वाली बात कुछ नहीं हो सकती कि भगवान श्री राम के भव्य मंदिर को बने अभी गिने-चुने दिन ही हुए हैं और हम दान-दक्षिणा के विवादों तथा जांच के चक्करों में उलझ गए हैं। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को बेहद चिंताजनक बताया है।
मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का विरोध
आध्यात्मिक गुरु ने देवस्थानों और धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में सरकारी अधिकारियों और प्रशासनिक हस्तक्षेप पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने पुरजोर शब्दों में कहा कि मंदिरों का संचालन धर्म के ज्ञाताओं, संतों और सनातन धर्म में गहरी आस्था रखने वाले लोगों के हाथों में ही होना चाहिए। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने देश में एक स्वतंत्र ‘सनातन बोर्ड’ (Sanatan Board) गठित करने की वकालत की। ठाकुर ने सुझाव दिया कि इस प्रस्तावित बोर्ड का सर्वोच्च नेतृत्व और कमान देश के चारों पूज्य शंकराचार्यों में से किसी एक को सौंपी जानी चाहिए, ताकि व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी और शास्त्रसम्मत रहे।
मंदिर के धन का दुरुपयोग महापाप
देवकीनंदन ठाकुर ने धर्मग्रंथों का संदर्भ देते हुए कहा कि जो कोई भी मंदिर की संपत्ति या चढ़ावे के धन का दुरुपयोग करता है, उसे शास्त्रों के अनुसार घोर नर्क और कठोरतम दैवीय दंड भुगतना पड़ता है। उन्होंने दो टूक कहा कि राम मंदिर की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले और दान में हेराफेरी करने वाले चाहे जो भी हों, उन्हें उनके पदों से तुरंत बेदखल किया जाना चाहिए। जिन्होंने भी यह अनुचित कार्य किया है, वे अपनी भूल स्वीकार करें और वह सारा पैसा तुरंत प्रभु श्री राम के चरणों में वापस सौंपें। उन्होंने कहा कि यदि लोगों को शास्त्रों में वर्णित पाप और उसके भयानक परिणामों का ज्ञान हो, तो कोई भी व्यक्ति ऐसी गलती करने का साहस नहीं करेगा।
भारतीय न्याय व्यवस्था की सुस्त प्रक्रिया पर उठाए सवाल
कथावाचक ने देश की न्यायिक प्रणाली (Judicial System) और अदालती प्रक्रिया में लगने वाले लंबे समय पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने आशंका जताते हुए कहा कि हमारी अदालतों में मामलों के निपटारे में इतनी लंबी अवधि लग जाती है कि कई बार अंतिम फैसला आने से पहले ही आरोपी की मृत्यु हो जाती है। ऐसे मामलों में न्याय पूरी तरह अधूरा रह जाता है। देवकीनंदन ठाकुर ने मांग की कि धार्मिक, नैतिक और आस्था से जुड़े संवेदनशील संवेदनशील विषयों में आरोपियों के खिलाफ वर्षों तक मुकदमे लटकाने के बजाय, त्वरित और समयबद्ध (Time-bound) कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
रात में शादी करने की आधुनिक प्रवृत्ति पर रोक की अपील
सामाजिक आचरण और आधुनिक जीवनशैली पर प्रहार करते हुए देवकीनंदन ठाकुर ने शादियों के समय पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि हमारे शास्त्रों में समय को तीन मुख्य भागों— देवता काल, पितर काल और दैत्य काल में विभाजित किया गया है। चूंकि रात्रि का समय दैत्यों (असुरों) का माना जाता है, इसलिए रात के अंधेरे में विवाह जैसे पवित्र और मांगलिक संस्कार को संपन्न करना किसी भी दृष्टिकोण से शास्त्रसम्मत और उचित नहीं है। उन्होंने सनातन समाज से इस कुप्रथा पर पुनर्विचार करने और प्राचीन काल की तरह दिन के उजाले में शादियां करने की अपील की।
‘गोधूलि बेला’ को बताया पाणिग्रहण संस्कार के लिए सर्वोत्तम समय
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में ‘गोधूलि बेला’ (शाम का समय) को विवाह संस्कार के लिए सबसे शुभ, पवित्र और प्राकृतिक रूप से अनुकूल माना गया है। मुगल काल के दौरान सुरक्षा कारणों और बाहरी आक्रमणों से बचने के लिए रात में शादियां करने की मजबूरी शुरू हुई थी, जिसे आज समाज ने एक फैशन और परंपरा बना लिया है। इसके साथ ही, उन्होंने शादी-समारोहों में बढ़ते मद्यपान और नशे के चलन पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विवाह हिंदू धर्म के 16 पवित्र संस्कारों में से एक है, जिसे पूर्णतः शुद्ध रहना चाहिए। मांगलिक उत्सवों में शराब का सेवन हमारी आने वाली पीढ़ियों के वैचारिक और सांस्कृतिक विकास को पूरी तरह बर्बाद कर रहा है, जिसे रोकने के लिए समाज को सादगी और धार्मिक मूल्यों को फिर से अपनाना होगा।










