Delimitation bill: केंद्र की मोदी सरकार देश के चुनावी और प्रशासनिक ढांचे में एक ऐतिहासिक और बहुत बड़ा बदलाव करने की तैयारी में जुट गई है। सूत्रों से मिली बेहद पुख्ता जानकारी के मुताबिक, लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े ‘परिसीमन विधेयक’ (Delimitation Bill) को फिर से धरातल पर उतारने की सक्रिय कोशिशें तेज हो चुकी हैं। सरकार का सीधा और साफ लक्ष्य है कि साल 2029 के अगले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले देश के सभी संसदीय क्षेत्रों के पुनर्गठन और सीमाओं को दोबारा तय करने की इस बेहद जटिल प्रक्रिया को पूरा कर लिया जाए। अगर ऐसा होता है, तो देश की राजनीति और चुनावी प्रतिनिधित्व की पूरी तस्वीर हमेशा के लिए बदल जाएगी।
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क्षेत्रीय क्षत्रपों को साधने की कवायद
चूंकि परिसीमन का मुद्दा बेहद संवेदनशील है और इससे राज्यों की राजनीतिक ताकत सीधे तौर पर प्रभावित होती है, इसलिए सरकार इस मोर्चे पर किसी भी तरह के खुले टकराव या विरोध से बचना चाहती है। यही वजह है कि संसद में बिल लाने से पहले ‘पर्दे के पीछे’ आम सहमति बनाने का एक बड़ा दौर शुरू किया जा चुका है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार ने देश के कई बड़े क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के साथ औपचारिक और अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला शुरू कर दिया है। इन गुप्त चर्चाओं और बैठकों की मेज पर दक्षिण से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और पूर्व से तृणमूल कांग्रेस (TMC) जैसे कड़े तेवर वाले दल भी शामिल हैं। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य इन क्षेत्रीय क्षत्रपों के मन में बैठे उस डर और चिंताओं को दूर करना है, जो उन्हें लोकसभा में अपने राज्यों के प्रतिनिधित्व और सीटों के घटने-बढ़ने को लेकर सता रही हैं।
टकराव नहीं, सिर्फ आम सहमति पर जोर
सरल भाषा में समझें तो परिसीमन का सीधा मतलब देश की मौजूदा आबादी और जनसांख्यिकीय बदलावों के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से तय करना है। बीते कुछ दशकों में दक्षिण भारतीय राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण पर बहुत अच्छा काम किया है, जबकि उत्तर भारत के राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी है। ऐसे में दक्षिण के राज्यों को यह बड़ी चिंता है कि नए परिसीमन से संसद में उनकी सीटें कम हो सकती हैं और उत्तर भारत का दबदबा बढ़ सकता है।
इस भारी राजनीतिक संवेदनशीलता को देखते हुए केंद्र सरकार बेहद सतर्क है और हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है। शीर्ष अधिकारियों का साफ कहना है कि जब तक देश के सभी प्रमुख और विपक्षी दलों के बीच एक न्यूनतम साझा ढांचा या फॉर्मूला तैयार नहीं हो जाता, तब तक इस विधेयक को संसद के पटल पर नहीं रखा जाएगा। इस ऐतिहासिक बिल को संसद में पेश करने का समय पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि क्षेत्रीय दलों के साथ चल रही इस बातचीत का नतीजा क्या निकलता है।
‘एक देश, एक चुनाव’ की भी तैयारी
केंद्र सरकार के चुनावी सुधारों का यह बड़ा चक्र केवल परिसीमन तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। सरकार इसके साथ ही अपने सबसे बड़े और महत्वाकांक्षी एजेंडे यानी ‘एक देश, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) के प्रस्ताव पर भी समानांतर रूप से आगे बढ़ रही है।
क्षेत्रीय दलों के साथ दिल्ली के गलियारों में जो गोपनीय बैठकें हो रही हैं, उनमें परिसीमन और एक साथ चुनाव कराने, दोनों ही बड़े मुद्दों को एक साथ मेज पर रखा गया है। सरकार की रणनीति यह है कि दोनों बड़े सुधारों पर एक साथ विपक्ष को मनाया जाए। अगर सरकार इस मोर्चे पर क्षेत्रीय और विपक्षी दलों का दिल और समर्थन जीतने में कामयाब रहती है, तो साल 2029 के आम चुनाव से पहले भारत की लोकतांत्रिक और चुनावी व्यवस्था का पूरा चेहरा बदल जाएगा। हालांकि, फिलहाल बैठकों और वार्ताओं का दौर जारी है और अंतिम फैसले की तरफ कदम बढ़ाए जा रहे हैं।










