
Delhi News: दिल्ली की एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (एसईएम) अदालत ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह-संयोजकों सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत दो और दिनों के लिए बढ़ा दी है। पुलिस की मांग पर अदालत ने यह फैसला सुनाया। इससे पहले दोपहर के सत्र में लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने उनकी रिहाई से जुड़े फैसले को सुरक्षित रख लिया था, लेकिन बाद में हिरासत बढ़ाने का आदेश दिया गया।
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सीजेपी का तीखा प्रहार, हिरासत को बताया ‘मानसिक यातना’

अदालत के इस फैसले पर सीजेपी ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। पार्टी की लीगल हेड रत्ना सिंह ने अदालत की पूरी कार्रवाई को एक ‘मखौल’ करार देते हुए न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने को पूरी तरह ‘अस्पष्ट’ और ‘मानसिक यातना’ बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले छह दिनों से कभी जमानतदार का सत्यापन न होने तो कभी जमानतदार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने जैसे बहानों की आड़ में किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लगातार सीमित किया जा रहा है।
दोपहर की सुनवाई के दौरान वकीलों ने सभी कानूनी पहलुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी थी और जोर देकर कहा था कि हिरासत बढ़ाने का कोई भी ठोस आधार या कारण पेश नहीं किया गया है। सीजेपी ने स्पष्ट किया है कि वे इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देंगे, क्योंकि यह स्पष्ट रूप से विपक्षी आवाजों को दबाने का एक राजनीतिक प्रयास है।
जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने और प्रदर्शन का मामला

पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब दिल्ली पुलिस ने 12 अक्तूबर को जंतर-मंतर को प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थलों की सूची से हटा दिया और रामलीला मैदान, बुराड़ी तथा सीबीडी मैदान जैसे वैकल्पिक स्थान तय किए। सीजेपी ने इस पाबंदी पर कड़ी आपत्ति जताई। इसके बाद सीजेपी नेता रांका, दास और अन्य कार्यकर्ता बैरिकेडिंग तोड़कर जंतर-मंतर पहुंचे और वहां तिरंगा लहराते हुए नारेबाजी की। मुख्य चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाताओं के नाम हटाए जाने के विरोध में यह प्रदर्शन किया जा रहा था। इसी दौरान पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था।
अदालत ने शुरुआत में उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजने के आदेश दिए थे। हालांकि, इसी मामले में शामिल एक अन्य नेता अजिंक्य शिंदे से नया बेल बॉन्ड भरवाकर उन्हें राहत दे दी गई।
नेताओं और संस्थापकों के तीखे आरोप

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने पुलिस और केंद्र सरकार की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कटाक्ष करते हुए पूछा कि क्या अब देश में राष्ट्रीय ध्वज फहराना भी गैरकानूनी हो गया है? उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि अगर वे विरोध की आवाजों को दबाना ही चाहते हैं, तो इन कायरतापूर्ण तरीकों के बजाय आधिकारिक रूप से आपातकाल घोषित करने की हिम्मत दिखाएं।
वहीं, इसी मामले में राहत पाने वाले अजिंक्य शिंदे ने आरोप लगाया कि सिर्फ तिरंगा फहराने और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाने के जुर्म में उनके साथियों को जेल भेजा गया है, और वह भी तब जब आशुतोष रांका का जन्मदिन था। उन्होंने मोदी-शाह सरकार पर शक्तियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि जेल भेजकर लोकतांत्रिक आवाजों को डराया नहीं जा सकता।
फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने राजधानी की राजनीति और प्रशासनिक निर्णयों पर एक बार फिर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां एक तरफ चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लग रहे हैं, तो दूसरी तरफ प्रदर्शन स्थलों के नियम और स्वतंत्रता का मुद्दा गरमाया हुआ है।
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