Deepu Chandra Das Family: “हमें पैसा नहीं न्याय चाहिए”, दीपू चंद्र दास के परिवार ने ठुकराया युनूस सरकार का लाखों का मुआवजा

दिसंबर में ईशनिंदा के झूठे आरोप में भीड़ द्वारा जिंदा जलाए गए दीपू चंद्र दास के पिता रबी चंद्र दास ने सरकार की 50 लाख की मदद ठुकरा दी है। उन्होंने कहा कि उनके बेटे की जान की कोई कीमत नहीं लगा सकता। क्या यूनुस सरकार हत्यारों को सजा दिला पाएगी?

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Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 12, 2026

Deepu Chandra Das Family: बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले में कट्टरपंथियों की उग्र भीड़ द्वारा दीपू चंद्र दास की नृशंस हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस दुखद घड़ी में, दीपू के शोकाकुल परिवार ने अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद युनूस को करारा नैतिक तमाचा जड़ा है। गरीबी और अभावों से जूझ रहे इस परिवार ने, जिसने अपने घर के एकमात्र कमाऊ सदस्य को खो दिया, सरकार द्वारा दिए जा रहे लाखों रुपये के मुआवजे को लेने से साफ इनकार कर दिया। यह साहसिक कदम बांग्लादेश में होने वाले चुनावों से ठीक पहले उठाया गया है, जिसे युनूस प्रशासन के लिए केवल एक अपमान ही नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली राजनीतिक और सामाजिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

दोषियों को सजा नहीं, दूतों के जरिए पैसों का लालच: युनूस सरकार की रणनीति फेल

दीपू चंद्र दास की हत्या के बाद से ही युनूस सरकार पर कानून-व्यवस्था और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हत्यारों को न्याय के कठघरे में खड़ा करने में विफल रहने के बाद, मोहम्मद युनूस ने खुद पीड़ित परिवार से मिलना या माफी मांगना उचित नहीं समझा। इसके बजाय, उन्होंने अपने दूतों को भेजकर मुआवजे का लालच देकर मामले को शांत करने की कोशिश की। लेकिन रबी चंद्र दास के स्वाभिमानी परिवार ने स्पष्ट कर दिया कि उनके बेटे के खून का सौदा नहीं किया जा सकता। इस घटना ने साबित कर दिया है कि न्याय की गुहार लगा रहे परिवारों के लिए सरकारी खैरात से ज्यादा कीमती उनके प्रियजनों का जीवन और दोषियों को मिलने वाली सजा है।

पिता की भावुक पुकार: “मुझे पैसे नहीं, बेटे के हत्यारों के लिए फांसी चाहिए”

दीपू के पिता रबी चंद्र दास ने नम आँखों और कड़े शब्दों में अपना दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “हम केवल पैसे के भूखे नहीं हैं। हमें वह इंसाफ चाहिए जो हमारे बेटे को मार डालने वालों को उनके अंजाम तक पहुँचाए।” उन्होंने बताया कि दीपू ही वह स्तंभ था जिसके सहारे पूरा घर चलता था। रबी चंद्र दास ने भावुक होकर सवाल किया कि यदि उनके बेटे पर कोई आरोप था भी, तो कानून को अपना काम करना चाहिए था। भीड़ द्वारा कानून को हाथ में लेना और नृशंस हत्या करना सभ्य समाज पर कलंक है। दीपू की माँ और पत्नी अभी भी गहरे सदमे में हैं, और उनके लिए कोई भी वित्तीय सहायता उस शून्य को नहीं भर सकती जो दीपू के जाने से पैदा हुआ है।

चुनाव से पहले मुआवजे का कार्ड: डॉ. सी.आर. आबरार का खाली हाथ लौटना

चुनावों से महज दो दिन पहले, युनूस के दूत बनकर शिक्षा सलाहकार डॉ. सी.आर. आबरार दीपू के घर पहुँचे थे। उन्होंने परिवार को शांत करने के लिए एक विस्तृत आर्थिक पैकेज का प्रस्ताव रखा, जिसमें घर बनाने के लिए 19.25 लाख रुपये, पिता और पत्नी के लिए अलग-अलग 7.7 लाख रुपये और बच्चे की शिक्षा के लिए 3.85 लाख रुपये शामिल थे। इस भारी-भरकम राशि के बावजूद, रबी चंद्र दास का जवाब अडिग था। उन्होंने कहा, “पैसे से मेरा बेटा वापस नहीं आएगा।” परिवार का यह निर्णय दर्शाता है कि वे सरकार की इस पेशकश को केवल चुनावी स्टंट और अपनी विफलता छिपाने का जरिया मान रहे हैं।

ईशनिंदा का झूठा आरोप और मानवता को शर्मसार करती नृशंसता

दीपू चंद्र दास की हत्या के पीछे की कहानी रूह कंपा देने वाली है। उन पर ईशनिंदा का झूठा आरोप लगाया गया था, जिसके बाद पागल हो चुकी कट्टरपंथी भीड़ ने उन्हें पीट-पीटकर मार डाला। मानवता की सारी हदें तब पार हो गईं जब उनकी लाश को एक व्यस्त चौराहे पर बांधकर आग के हवाले कर दिया गया। इस भयानक कृत्य के दौरान प्रशासन मौन रहा। युनूस सरकार ने शुरुआत में इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बढ़ा और मानवाधिकार संगठनों ने निंदा की, तब जाकर एक ठंडा सा आधिकारिक बयान जारी किया गया, जिसमें न तो संवेदना थी और न ही दोषियों को पकड़ने का कोई ठोस संकल्प।