जलवायु परिवर्तन का गहरा असर: बिहार में घट रही बारिश, बढ़ रहा तापमान

पटना बिहार सहित देश भर में जलवायु परिवर्तन का गंभीर असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है, जिससे मौसम का स्वाभाविक तेवर पूरी तरह बिगड़ चुका है और ऋतुओं का स्वरूप बेरंग हो रहा है। मौसम विभाग ने पिछले दो दशकों में तेजी से बदले इस पर्यावरण संकट के कारणों का एक विशेष अध्ययन करने का फैसला लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, बिहार सहित देश भर में बारिश की गतिविधियां लगातार कम हो रही हैं और मानसून की चाल बुरी तरह बाधित हुई है। इस वजह से न केवल बारिश के दिनों में हीट वेव की स्थिति बन रही

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Published On :

जून 22, 2026

पटना
बिहार सहित देश भर में जलवायु परिवर्तन का गंभीर असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है, जिससे मौसम का स्वाभाविक तेवर पूरी तरह बिगड़ चुका है और ऋतुओं का स्वरूप बेरंग हो रहा है। मौसम विभाग ने पिछले दो दशकों में तेजी से बदले इस पर्यावरण संकट के कारणों का एक विशेष अध्ययन करने का फैसला लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, बिहार सहित देश भर में बारिश की गतिविधियां लगातार कम हो रही हैं और मानसून की चाल बुरी तरह बाधित हुई है। इस वजह से न केवल बारिश के दिनों में हीट वेव की स्थिति बन रही है, बल्कि सालभर के कुल वर्षापात (Rainfall) के आंकड़े भी साल-दर-साल लगातार घटते जा रहे हैं, जो कृषि प्रधान बिहार के लिए एक खतरे की बड़ी घंटी है।

पिछले दो दशकों में 13 साल सूखा जैसे हालात
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 20 साल में बिहार के भीतर ऐसे 13 मौके आए हैं जब मानसून अवधि में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है। आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2025 में 31%, 2024 में 20%, 2023 में 23%, 2022 में 31% और 2018 में 25% कम वर्षा हुई थी, जबकि इस साल भी अब तक सूबे में 41% बारिश की भारी कमी बनी हुई है। जलवायु विशेषज्ञ प्रो. डॉ. प्रधान पार्थसारथी के अनुसार, बिहार में सावन और भादो के महीने में होने वाली पारंपरिक धीमी और लगातार बारिश, जिसे स्थानीय भाषा में 'झपसी' कहा जाता था, वह पिछले डेढ़ दशक से पूरी तरह गायब हो चुकी है। इस झपसी से न केवल धान की फसलों को प्रचुर लाभ मिलता था, बल्कि वातावरण का तापमान भी नियंत्रित रहता था, लेकिन अब नई पीढ़ी इस अनमोल मौसमी घटना से पूरी तरह वंचित हो चुकी है।

देश के अलग-अलग केंद्रों को सौंपी गई जिम्मेदारी
मौसम विभाग की इस विशेष योजना के तहत देश के विभिन्न प्रमुख केंद्रों को अध्ययन की अलग-अलग कमान सौंपी गई है। इसके तहत चंडीगढ़ केंद्र पश्चिमी विक्षोभ, अहमदाबाद हीट वेव व कोल्ड वेव, भोपाल मानसून के प्रसार, भुवनेश्वर ट्रॉपिकल साइक्लोन और जयपुर केंद्र डेजर्ट मेट्रोलॉजी पर अध्ययन करेगा, जबकि हैदराबाद को समेकित शहरी मौसम प्रणाली की जिम्मेदारी मिली है। गौरतलब है कि भारत में साल 1901 से 1930 की तुलना में 2015 से 2024 के बीच औसत तापमान में 0.9 डिग्री सेल्सियस की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के कारण हरित क्षेत्र में कमी, वज्रपात की अप्रत्याशित घटनाएं, शहरी बाढ़, ग्राउन्ड वाटर पर असर पड़ रहा है, जिसे रोकने के लिए अब यह वैज्ञानिक अध्ययन बेहद मील का पत्थर साबित होगा।