China Iran Military: मिडिल ईस्ट में जारी भीषण संघर्ष के बीच एक सनसनीखेज खुलासे ने वैश्विक राजनीति में खलबली मचा दी है। अमेरिका की एक ताजा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन, ईरान को न केवल कूटनीतिक बल्कि खतरनाक सैन्य और तकनीकी सहायता भी प्रदान कर रहा है। यूएस-चाइना इकोनॉमिक एंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन द्वारा जारी इस रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग अब पर्दे के पीछे से निकलकर सीधे तौर पर तेहरान के रक्षा तंत्र को मजबूत करने में जुट गया है। यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब ईरान और इजरायल के बीच तनाव अपने चरम पर है, जिससे आने वाले समय में महाशक्तियों के बीच टकराव की आशंका और गहरा गई है।
मिसाइल और ड्रोन तकनीक का हस्तांतरण: चीन की बदली हुई रणनीति
अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक, चीन अब अपनी पुरानी सावधानी भरी रणनीति को त्याग चुका है। पहले चीन इस डर से ईरान को सीधी सैन्य मदद देने से बचता था कि कहीं खाड़ी के अन्य देशों (जैसे सऊदी अरब और यूएई) के साथ उसके संबंध खराब न हो जाएं। तब वह केवल ‘ड्यूल यूज’ (दोहरे उपयोग वाली) तकनीक ही मुहैया कराता था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। रिपोर्ट दावा करती है कि चीन अब ईरान को उन्नत ड्रोन तकनीक, एंटी-शिप क्रूज मिसाइलें और रॉकेट फ्यूल (रॉकेट ईंधन) बनाने के लिए आवश्यक जटिल तकनीकी उपकरण सीधे तौर पर सप्लाई कर रहा है। यह ईरान की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाने वाला कदम है।
रॉकेट फ्यूल के लिए रसायनों की गुप्त सप्लाई: जहाजों का खुलासा
रिपोर्ट में एक बेहद चौंकाने वाली घटना का जिक्र किया गया है। 2 मार्च 2026 को चीन के दो संदिग्ध जहाज भारी मात्रा में ऐसे रसायन लेकर ईरान की ओर रवाना हुए, जिनका उपयोग उच्च क्षमता वाले रॉकेट ईंधन बनाने में किया जाता है। इन रसायनों में मुख्य रूप से सोडियम परक्लोरेट जैसे तत्व शामिल थे। सोडियम परक्लोरेट का इस्तेमाल लंबी दूरी की मिसाइलों और रॉकेटों को ऊर्जा देने के लिए किया जाता है। अमेरिकी खुफिया तंत्र का मानना है कि यह सप्लाई ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को गति देने के लिए भेजी गई थी, जो सीधे तौर पर क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।
बेइदो नेविगेशन सिस्टम और तकनीकी सहयोग: चीन का ‘जीपीएस’ ईरान के हाथ
सैन्य हार्डवेयर के अलावा, चीन अपनी अंतरिक्ष और नेविगेशन तकनीक का भी ईरान को भरपूर लाभ उठाने दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान अब चीन के बेइदो नेविगेशन सिस्टम (BNS) का सक्रिय रूप से उपयोग कर रहा है। यह सिस्टम ठीक वैसे ही काम करता है जैसे अमेरिका का जीपीएस (GPS), लेकिन युद्ध की स्थिति में अमेरिका जीपीएस की पहुंच को बाधित कर सकता है। ऐसे में बेइदो का इस्तेमाल करके ईरान अपने ड्रोन और मिसाइलों को सटीक निशाने पर लगाने की क्षमता हासिल कर चुका है। यह तकनीकी तालमेल तेहरान को अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद आधुनिक युद्ध लड़ने में सक्षम बना रहा है।
ब्रिक्स और एससीओ के जरिए मजबूत होते रिश्ते: कूटनीतिक कवच
चीन और ईरान के बीच बढ़ती यह नजदीकी केवल सैन्य समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह BRICS और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भी दिखाई दे रही है। इन संगठनों के माध्यम से दोनों देश पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को चुनौती दे रहे हैं। साल 2021 में दोनों देशों के बीच हुआ 25 साल का रणनीतिक समझौता इस साझेदारी की नींव है। इस महा-समझौते के तहत चीन ईरान के बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों और ऊर्जा क्षेत्रों में अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है, जिसके बदले में ईरान उसे भारी छूट पर कच्चे तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित कर रहा है।
वैश्विक सुरक्षा के लिए नई चुनौती
ईरान और चीन की यह बढ़ती सैन्य जुगलबंदी वाशिंगटन और उसके सहयोगियों के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गई है। एक तरफ जहां अमेरिका ईरान पर प्रतिबंधों के जरिए दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं चीन की तकनीकी और आर्थिक मदद उन प्रतिबंधों को बेअसर कर रही है। यदि चीन इसी तरह रॉकेट फ्यूल और मिसाइल तकनीक की सप्लाई जारी रखता है, तो मिडिल ईस्ट में शक्ति का संतुलन पूरी तरह बिगड़ सकता है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अमेरिका इस नई सैन्य धुरी के खिलाफ क्या कड़ा रुख अख्तियार करता है।
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