Chidambaram vs PM Modi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के बीच बयानों का दौर इन दिनों राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ जैसे तंजों पर पलटवार करते हुए चिदंबरम ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहलाने पर खुशी और गर्व महसूस होता है, जबकि प्रधानमंत्री की टिप्पणियां केवल नए नारे गढ़ने तक सीमित हैं।
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स्वघोषित कवि और नए शब्दों पर तंज

पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथों लेते हुए उन्हें “स्वघोषित कवि” करार दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री अक्सर गुजराती में कविताएं लिखते हैं और नए-नए नारे गढ़ने के शौकीन हैं। चिदंबरम के अनुसार, पिछले 12 वर्षों में प्रधानमंत्री लगभग 20 से 25 नए नारे और शब्द ला चुके हैं, जिनमें ‘अच्छे दिन’ से लेकर हालिया ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ शामिल हैं।
कांग्रेस नेता ने कहा कि ये टिप्पणियां सोशल मीडिया पर, विशेषकर युवा वर्ग (जेन जी) के बीच मीम्स का विषय बन रही हैं। उन्होंने दावा किया कि जब उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है, तो उसे 55 लाख लाइक्स मिले। उनके मुताबिक, इतनी बड़ी संख्या में लोगों का जुड़ना यह दर्शाता है कि जनता प्रधानमंत्री की इस प्रकार की शब्दावली को किस रूप में देख रही है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल
चिदंबरम ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को अत्यधिक खराब और हास्यास्पद करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के तहत नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन और प्रोफेसर सी.एन.आर. राव जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों के नाम भी मतदाता सूची से हटाए जाने की बात सामने आई है।
उन्होंने आंकड़े साझा करते हुए बताया कि:
पहला चरण: 65.1 लाख नाम हटाए गए (7.9 प्रतिशत)।
दूसरा चरण: 6.5 करोड़ नाम हटाए गए (12.6 प्रतिशत)।
तीसरा चरण: 6.1 करोड़ नाम हटाए गए (17.18 प्रतिशत)।
कुल प्रभाव: कुल मिलाकर लगभग 13.30 करोड़ नाम मतदाता सूची से बाहर किए गए।
कांग्रेस नेता ने सवाल उठाया कि क्या इतनी भारी संख्या में लोग बांग्लादेश या किसी अन्य देश से अवैध प्रवासी बनकर भारत आए थे? उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति भारत में पैदा हुआ है और 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, तो उसे वोट देने का मौलिक अधिकार है। अपनी नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होनी चाहिए, न कि आम नागरिक की।
क्या है ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ का पूरा विवाद?

यह पूरा विवाद प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस के लाल किले से दिए गए भाषण और उनके हालिया वडोदरा दौरे के बयानों से उपजा है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में चेतावनी दी थी कि देश के जंगलों में सशस्त्र नक्सलवाद लगभग समाप्त हो चुका है, लेकिन कुछ संस्थानों में अभी भी वैचारिक या ‘दिमागी नक्सल’ सोच मौजूद है, जिसे युवाओं को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
इसके अलावा, वडोदरा में ‘नमो फॉर विकसित भारत’ कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने डबल-स्टैक कंटेनर मालगाड़ी के फायदों का जिक्र करते हुए विपक्ष पर ‘नाराज फूफा’ का तंज कसा था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि ऐसे आलोचक हमेशा विकास कार्यों में कमियां निकालते हैं और यह पूछते हैं कि इससे पारंपरिक ट्रक चालकों और मालिकों का क्या होगा। इन्हीं बयानों के जवाब में अब राजनीतिक जुबानी जंग तेज हो गई है।
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