Chehlum 2026: चेहल्लुम, जिसे अरबी में अरबईन कहा जाता है, इस्लामी परंपरा में बेहद महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। यह दिन मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी आशूरा के ठीक 40 दिन बाद मनाया जाता है। वर्ष 2026 में चेहल्लुम 4 अगस्त को मनाया जा रहा है। यह केवल शोक का दिन नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, धैर्य और मानवता के मूल्यों को याद करने का अवसर भी है। यह दिन Imam Husayn ibn Ali और कर्बला में उनके साथ शहीद हुए साथियों की कुर्बानी को श्रद्धापूर्वक याद करने के लिए मनाया जाता है।
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‘चेहल्लुम’ और ‘अरबईन’ का अर्थ
‘चेहल्लुम’ शब्द फारसी भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है ‘चालीसवां’। वहीं अरबी भाषा में इसी अवसर को अरबईन कहा जाता है। कई संस्कृतियों में किसी प्रियजन के निधन के 40वें दिन उनकी याद में प्रार्थना और श्रद्धांजलि देने की परंपरा रही है। इसी परंपरा के आधार पर कर्बला के शहीदों की याद में यह दिन मनाया जाता है।
कर्बला की ऐतिहासिक घटना
680 ईस्वी में वर्तमान इराक के कर्बला में इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक घटित हुई। उस समय इमाम हुसैन ने तत्कालीन शासक यज़ीद के अन्याय और अत्याचार के सामने झुकने से इनकार कर दिया। इसके बाद हुई लड़ाई में इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने अपनी जान कुर्बान कर दी। इस घटना के बाद उनके परिवार के सदस्यों को बंदी बना लिया गया। रिहा होने के बाद जब वे कर्बला लौटे, तो शहीदों की मजारों पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसी घटना को चेहल्लुम की शुरुआत माना जाता है।
हजरत जैनब का साहस
कर्बला की कहानी Zaynab bint Ali के साहस के बिना अधूरी मानी जाती है। इमाम हुसैन की बहन हजरत जैनब ने कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी। कैद में रहने के बावजूद उन्होंने यज़ीद के दरबार में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और कर्बला की सच्चाई दुनिया के सामने रखी। उनका साहस आज भी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक माना जाता है।
अरबईन वॉक: दुनिया की सबसे बड़ी पैदल धार्मिक यात्रा
चेहल्लुम के अवसर पर इराक में आयोजित होने वाली अरबईन वॉक दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक पैदल यात्राओं में गिनी जाती है। इसमें करोड़ों श्रद्धालु नजफ से कर्बला तक लगभग 80 किलोमीटर की यात्रा पैदल पूरी करते हैं। इस यात्रा की सबसे खास बात यह है कि रास्ते भर स्थानीय लोग श्रद्धालुओं के लिए भोजन, पानी और ठहरने की निःशुल्क व्यवस्था करते हैं। यहां सेवा, समानता और भाईचारे की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
भारत में चेहल्लुम की परंपरा
भारत में भी चेहल्लुम श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाता है। लखनऊ, हैदराबाद, दिल्ली और कोलकाता सहित कई शहरों में मातमी जुलूस निकाले जाते हैं। ताजिए और अलम के साथ श्रद्धालु इमाम हुसैन को याद करते हैं। इस अवसर पर कई स्थानों पर लंगर, पानी और शर्बत की व्यवस्था की जाती है। विभिन्न धर्मों के लोग भी इस सेवा कार्य में भाग लेते हैं, जो भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है।
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चेहल्लुम का संदेश
आपको बता दें कि, चेहल्लुम आज भी समाज को कई महत्वपूर्ण सीख देता है। यह दिन सिखाता है कि अन्याय के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए, कठिन समय में धैर्य बनाए रखना चाहिए और बिना किसी भेदभाव के मानवता सी सेवा करनी चाहिए। यह अवसर केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, करुणा और भाईचारे के मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा भी देता है। इमाम हुसैन की कुर्बानी आज भी दुनिया भर के लोगों के लिए साहस, इंसाफ और इंसानियत का संदेश बनी हुई है।








