CBSE OSM Row: देश की शिक्षा व्यवस्था और करोड़ों छात्रों के भविष्य से जुड़े केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) में ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) सिस्टम को लेकर एक बहुत बड़ा राजनीतिक बवंडर खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने इस पूरे मामले में सीधे मोदी सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कटघरे में खड़ा करते हुए गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। विपक्ष का दावा है कि बोर्ड के भीतर से ही भारी विरोध और वित्तीय नुकसान की चेतावनियों के बावजूद, जानबूझकर करोड़ों रुपये के महंगे टेंडर पास किए गए। इस पूरे विवाद में अब राहुल गांधी की एंट्री हो चुकी है, जिन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और पूरे मामले की स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग कर डाली है।
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टेंडर में 10 करोड़ का ‘बड़ा खेल’! जयराम रमेश ने खोले अंदर के पन्ने
इस पूरे घोटाले की परतों को खोलते हुए कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने शुक्रवार को बेहद चौंकाने वाले आंकड़े देश के सामने रखे। उन्होंने साफ किया कि इस भारी-भरकम वित्तीय बोझ को लेकर बोर्ड के भीतर पहले से ही खलबली मची हुई थी।
इस टेंडर को महंगे दामों पर पास करने के पीछे की असली क्रोनोलॉजी क्या है, वो हम आपको आगे बताएंगे… लेकिन उससे पहले ये जान लीजिए कि पैसों का क्या खेल हुआ? जयराम रमेश ने एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि ओएसएम सिस्टम से जुड़े टेंडर की अनुमानित लागत में करीब 10 करोड़ रुपये की सीधी बढ़ोतरी की गई। उनके मुताबिक, सीबीएसई द्वारा जारी शुरुआती दो टेंडरों में इस पूरे काम की वैल्यू 28 करोड़ रुपये तय की गई थी, लेकिन जब फाइनल वर्क ऑर्डर जारी हुआ, तो यह रकम अचानक बढ़कर 38.46 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। कांग्रेस का सीधा आरोप है कि अगर वास्तविक रूप से स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं (आंसर शीट्स) के आधार पर ईमानदारी से हिसाब लगाया जाता, तो यह काम महज 25.39 करोड़ रुपये में हो जाना चाहिए था। तो फिर ये एक्स्ट्रा करोड़ों रुपये किसकी जेब में गए?
संसदीय समिति के सामने खुला राज
यह मामला तब और ज्यादा गंभीर हो गया जब शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति की बैठक में एक 18 वर्षीय व्हिसलब्लोअर सार्थक सिद्धांत ने गवाही दी। उसकी दलीलें सुनने के बाद समिति ने सीबीएसई से खरीद प्रक्रिया को लेकर कई कड़े सवाल पूछे, लेकिन बोर्ड का कोई भी आला अधिकारी इसका संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया।
इसी बीच, बढ़ते दबाव को देखकर सरकार ने सीबीएसई के कुछ शीर्ष अधिकारियों को उनके पदों से हटा दिया, जिस पर लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने तीखा हमला बोला है। राहुल गांधी ने साफ शब्दों में कहा कि बड़े अफसरों को हटाना महज एक ‘लीपापोती’ है और असली सच्चाई को छिपाने की कोशिश है। उन्होंने मांग की है कि जब तक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा नहीं देते या उन्हें हटाया नहीं जाता, तब तक केंद्र सरकार द्वारा गठित एक सदस्यीय जांच समिति केवल एक औपचारिकता और ढोंग बनकर रह जाएगी।
आखिर क्या है यह पूरा ‘OSM विवाद’ और लिखावट का हेरफेर?
आपको बता दें कि यह पूरा विवाद सिर्फ पैसों की हेराफेरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे छात्रों के भविष्य और उनके रिजल्ट से जुड़ा है। दरअसल, हाल ही में कक्षा 12वीं के कई छात्रों ने जब अपनी स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाएं ऑनलाइन देखीं, तो उनके होश उड़ गए। छात्रों का दावा है कि बोर्ड द्वारा दी गई उत्तर पुस्तिकाओं में जो लिखावट (Handwriting) है, वो उनकी असली लिखावट से मेल ही नहीं खा रही है। इसके बाद से ही कॉपियों की अदला-बदली और मार्किंग सिस्टम में बड़ी गड़बड़ी के आरोप लगने शुरू हो गए।
इस महा-विवाद के बाद कैबिनेट सचिवालय ने 3 जून को इस पूरी खरीद प्रक्रिया की जांच के लिए एक सदस्यीय समिति तो बना दी है, लेकिन कांग्रेस का मानना है कि बिना निष्पक्ष न्यायिक जांच के दूध का दूध और पानी का पानी नहीं होने वाला।








