कोर्ट में पलटा मामला: ‘पाकिस्तानी’ कहे गए व्यक्ति ने दिखाया भारतीय पासपोर्ट, जज ने लगाई फटकार

हैदराबाद तेलंगाना हाई कोर्ट ने बुधवार को एक 33 वर्षीय व्यक्ति को अपनी रिट अपील वापस लेने की अनुमति दे दी। इस व्यक्ति को पहले पाकिस्तानी नागरिक घोषित किया जा चुका था, लेकिन अदालत में उसने अचानक अपना एक भारतीय पासपोर्ट पेश कर दिया, जिसके बारे में उसका दावा था कि यह उसे 2022 में जारी किया गया था। क्या है पूरा मामला? रिपोर्ट के मुताबिक, हैदराबाद के याकूतपुरा निवासी सैयद अली हुसैन रिजवी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसने अदालत से मांग की थी कि हैदराबाद पुलिस की स्पेशल ब्रांच के अधिकारियों द्वारा उसके घर पर की

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Published On :

फ़रवरी 26, 2026

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हैदराबाद
तेलंगाना हाई कोर्ट ने बुधवार को एक 33 वर्षीय व्यक्ति को अपनी रिट अपील वापस लेने की अनुमति दे दी। इस व्यक्ति को पहले पाकिस्तानी नागरिक घोषित किया जा चुका था, लेकिन अदालत में उसने अचानक अपना एक भारतीय पासपोर्ट पेश कर दिया, जिसके बारे में उसका दावा था कि यह उसे 2022 में जारी किया गया था।

क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट के मुताबिक, हैदराबाद के याकूतपुरा निवासी सैयद अली हुसैन रिजवी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसने अदालत से मांग की थी कि हैदराबाद पुलिस की स्पेशल ब्रांच के अधिकारियों द्वारा उसके घर पर की जा रही पूछताछ और दौरों पर रोक लगाई जाए। रिजवी का आरोप था कि पुलिस उसे देश में रहने के लिए लंबी अवधि के वीजा के लिए आवेदन करने को मजबूर कर रही है, जबकि वह हैदराबाद में ही पैदा हुआ, वहीं पला-बढ़ा और उसकी शादी भी एक भारतीय नागरिक से हुई है।

सरकार और पुलिस की दलीलें
गृह विभाग के सरकारी वकील महेश राजे ने अदालत के सामने कई अहम तथ्य रखे। पाकिस्तानी रिकॉर्ड: रिजवी का जन्म कराची में हुआ था। उसकी मां गोहर फातिमा के पाकिस्तानी पासपोर्ट में उसका नाम 'इमरान आबिद उर्फ इमरान हुसैन' दर्ज था। वे रिजवी के जन्म के तीन साल बाद फरवरी 1994 में भारत आए थे।

पासपोर्ट का कोई रिकॉर्ड नहीं: सरकारी वकील ने बताया कि रिजवी को कभी कोई भारतीय पासपोर्ट जारी नहीं किया गया। यहां तक कि खुद रिजवी ने अपने हलफनामे में यह बात मानी थी कि उसने कभी भारतीय पासपोर्ट के लिए आवेदन नहीं किया है। वीजा के लिए खुद किया था आवेदन: सरकार ने बताया कि रिजवी ने 5 जुलाई 2025 को खुद को पाकिस्तानी नागरिक घोषित करते हुए लॉन्ग-टर्म वीजा (LTV) के लिए आवेदन किया था।

अदालत में क्या हुआ?
बुधवार को सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस जी. एम. मोहिउद्दीन की डिवीजन बेंच के सामने रिजवी के वकील एस. श्रीधर ने अचानक अपने मुवक्किल का भारतीय पासपोर्ट पेश कर दिया। इस पर सरकारी अधिकारियों ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास इस पासपोर्ट का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।

जब सरकार ने वीजा आवेदन की बात उठाई, तो रिजवी के वकील ने कहा कि पुलिस ने जबरन उनके मुवक्किल से उस आवेदन पर हस्ताक्षर करवाए थे। बेंच ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए पूछा कि क्या यह 'अहम बात' (जबरन हस्ताक्षर वाली) कभी हलफनामे में बताई गई थी? वकील के पास इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं था।

अदालत ने मौखिक रूप से कहा- अगर उसके पास पासपोर्ट था, तो पुलिस के घर आने पर उसने उन्हें क्यों नहीं दिखाया? वह अब भी उन्हें दिखा सकता है… अगर आप उन्हें पासपोर्ट दिखाते हैं और वे संतुष्ट हो जाते हैं, तो मामला यहीं खत्म हो जाता है। हर दिन नया तथ्य सामने आ रहा है… आप जो पासपोर्ट दिखा रहे हैं, उसमें नाम उसकी मां के पासपोर्ट में दर्ज नाम से अलग है। क्या आप उम्मीद करते हैं कि हम इन सबमें पड़ें और कोई टिप्पणी करें?

कोर्ट का अंतिम फैसला
अदालत के तीखे सवालों के बाद, याचिकाकर्ता के वकील ने रिट अपील वापस लेने की बात कही। बेंच ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि अदालत इस पासपोर्ट की प्रामाणिकता की जांच नहीं कर सकती। इसके साथ ही, अदालत ने अधिकारियों को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने की छूट दे दी। इससे पहले, पिछले महीने एक सिंगल-जज बेंच ने भी यह कहते हुए मामले में दखल देने से इनकार कर दिया था कि पुलिस के दौरे वीजा नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए थे और इन्हें दंडात्मक कार्रवाई नहीं माना जा सकता।

 

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