Iran War : मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) में जारी भीषण सैन्य संघर्ष ने दुनिया के दो सबसे पुराने और भरोसेमंद सहयोगियों, अमेरिका और ब्रिटेन के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है। ईरान के विरुद्ध जारी इस युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने बुधवार को राष्ट्र के नाम एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़ा संबोधन दिया, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि ब्रिटेन इस युद्ध में शामिल नहीं होगा। स्टार्मर का यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस तीखी बयानबाजी के जवाब में आया है, जिसने नाटो (NATO) गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए थे।
प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का ‘ब्रिटेन फर्स्ट’ रुख
अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री स्टार्मर ने बेहद दृढ़ लहजे में कहा कि उन पर चाहे जितना भी बाहरी दबाव बनाया जाए या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कितना भी शोर हो, वे केवल वही फैसले लेंगे जो ब्रिटेन के राष्ट्रीय हित में होंगे। उन्होंने साफ शब्दों में संदेश दिया कि यह युद्ध ब्रिटेन का नहीं है और उनके देश को जबरन इस सैन्य दलदल में नहीं घसीटा जा सकता। स्टार्मर की यह टिप्पणी सीधे तौर पर उन देशों के लिए एक चेतावनी थी जो ब्रिटेन को अपनी सैन्य रणनीति का हिस्सा बनाना चाहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश सैनिकों का जीवन किसी दूसरे देश के रणनीतिक लक्ष्यों के लिए दांव पर नहीं लगाया जाएगा।
डोनाल्ड ट्रंप की तीखी चेतावनी और नाटो पर संकट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में यूरोपीय देशों, विशेषकर इटली और स्पेन द्वारा अमेरिकी लड़ाकू विमानों को अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करने से रोकने पर गहरी नाराजगी जताई थी। ट्रंप ने इन देशों को ‘स्वार्थी’ करार देते हुए यहां तक कह दिया था कि वे नाटो से बाहर निकलने पर विचार कर रहे हैं। मंगलवार को ट्रंप ने ब्रिटेन को दो टूक लहजे में चेतावनी दी थी कि यदि वह इस युद्ध में अमेरिका का कंधा नहीं बनता, तो भविष्य में किसी भी संकट के समय अमेरिका उसकी कोई मदद नहीं करेगा। ट्रंप का यह रुख दिखाता है कि अमेरिका अब ‘बिना शर्त सहयोग’ की नीति को त्याग चुका है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और तेल की राजनीति
डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन पर तंज कसते हुए यह भी कहा था कि यदि ब्रिटेन को होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के रास्ते कच्चे तेल की आपूर्ति चाहिए, तो वह खुद वहां जाकर उसे खुलवाए। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि ब्रिटेन ऐसा नहीं कर सकता, तो वह अमेरिका से तेल खरीदने के लिए तैयार रहे। गौरतलब है कि दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस इसी संकीर्ण समुद्री मार्ग से गुजरता है। अमेरिका और इजरायल के हमलों के जवाब में ईरान ने इस रूट को बंद कर दिया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में हाहाकार मचा हुआ है और कीमतें आसमान छू रही हैं।
ब्रिटेन की वैकल्पिक रणनीति: ग्लोबल समिट का आयोजन
भले ही कीर स्टार्मर ने युद्ध के मैदान में उतरने से इनकार कर दिया हो, लेकिन वे वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव को लेकर बेहद गंभीर हैं। इस आर्थिक संकट से निपटने के लिए उन्होंने ब्रिटेन में एक विशाल ‘ग्लोबल समिट’ बुलाने का ऐलान किया है। इस शिखर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य युद्ध में सीधे तौर पर शामिल हुए बिना कूटनीतिक और सुरक्षात्मक तरीकों से तेल की सप्लाई चेन को बहाल करना है। ब्रिटेन चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय मिलकर एक ऐसा रास्ता निकाले जिससे ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
35 देशों का समर्थन और कूटनीति की जीत
स्टार्मर द्वारा प्रस्तावित इस ग्लोबल समिट में अब तक 35 देशों ने शामिल होने की पुष्टि कर दी है। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि दुनिया के कई देश अमेरिका की युद्धोन्मादी नीति के बजाय कूटनीतिक समाधान के पक्षधर हैं। ब्रिटेन का यह कदम दिखाता है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी एक स्वतंत्र पहचान और नीति बनाए रखना चाहता है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस समिट पर टिकी हैं कि क्या ब्रिटेन बिना गोली चलाए वैश्विक तेल संकट का समाधान निकालने में सफल हो पाता है या नहीं। यह घटनाक्रम आने वाले समय में अमेरिका और ब्रिटेन के रिश्तों की नई दिशा तय करेगा।
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