Bhagat Singh : भगत सिंह ने सिर्फ अंग्रेजों से लड़ाई नहीं लड़ी, उनके विचारों की ताकत समझिए

कांग्रेस के राष्ट्रीय सम्मेलन में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और सरकार पर तीखे तंज कसे। इसके बाद बीजेपी ने राहुल गांधी की भाषा और राजनीतिक शैली पर निशाना साधा। जेपी नड्डा समेत बीजेपी नेताओं के पलटवार के बाद कांग्रेस और बीजेपी के बीच सियासी टकराव फिर तेज हो गया।

Bhagat Singh

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अगस्त 14, 2026

Bhagat Singh : सरदार भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की क्रांतिकारी धारा के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं। उनकी लोकप्रियता सिर्फ उनके साहस, संघर्ष और शहादत की वजह से नहीं बनी, बल्कि इसके पीछे उनकी असाधारण वैचारिक क्षमता भी थी। महज 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने इतिहास, राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और दर्शन जैसे विषयों का गंभीर अध्ययन किया। उनका सपना केवल अंग्रेजी हुकूमत को भारत से बाहर करना नहीं था। वे ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना करते थे, जहां राजनीतिक आजादी के साथ सामाजिक और आर्थिक बराबरी भी हो तथा किसी व्यक्ति की गरिमा जाति, धर्म, संपत्ति या सत्ता से तय न हो।

क्रांति का मतलब सिर्फ सत्ता बदलना नहीं था

भगत सिंह के लिए आजादी का अर्थ केवल विदेशी शासन का अंत नहीं था। वे मानते थे कि यदि अंग्रेज भारत छोड़ दें, लेकिन शोषण और असमानता की व्यवस्था कायम रहे, तो ऐसी स्वतंत्रता अधूरी होगी। उनका जोर समाज की बुनियादी संरचना में बदलाव पर था। वे चाहते थे कि मेहनतकश लोगों को अधिकार मिले और ऐसी व्यवस्था बने जिसमें गरीब और कमजोर वर्गों का शोषण न हो। इसी सोच ने उनकी क्रांतिकारी विचारधारा को सामान्य राजनीतिक संघर्ष से अलग पहचान दी।

जलियांवाला बाग की घटना ने छोड़ी गहरी छाप

28 सितंबर 1907 को जन्मे भगत सिंह जब करीब 12 वर्ष के थे, तब जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाई गई थीं। घटना के बाद भगत सिंह वहां पहुंचे और खून से सनी मिट्टी को अपने साथ लेकर आए। उन्होंने उस मिट्टी को अपने लिए आजादी की लड़ाई की एक भावनात्मक निशानी की तरह संभालकर रखा।

शादी से इनकार कर देश सेवा का रास्ता चुना

किशोरावस्था में जब परिवार की ओर से उनकी शादी का दबाव बढ़ा, तो भगत सिंह ने अपने जीवन को देश की आजादी के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया। वे परिवार को पत्र लिखकर घर से निकल गए और कानपुर पहुंचकर गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार ‘प्रताप’ से जुड़े। अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका जीवन भारत की स्वतंत्रता के उद्देश्य के लिए समर्पित हो चुका है। परिवार में पहले भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों के बलिदान को देखते हुए वे निजी जीवन की जिम्मेदारियों के बजाय देश की सेवा को प्राथमिकता देना चाहते थे।

प्रताप अखबार में बलवंत नाम से किया काम

1923-24 के दौरान भगत सिंह ने ‘प्रताप’ में ‘बलवंत’ नाम से काम किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा और बी.के. शर्मा जैसे युवाओं से हुई। आगे चलकर ये सभी क्रांतिकारी आंदोलन में उनके साथी बने। कानपुर में ही भगत सिंह का संपर्क हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से हुआ। संगठन के प्रमुख क्रांतिकारियों में चंद्रशेखर आजाद भी शामिल थे। बाद में भगत सिंह ने संगठन की विचारधारा को अधिक समाजवादी दिशा देने के लिए उसके नाम में ‘सोशलिस्ट’ शब्द जोड़ने पर जोर दिया।

नौजवान सभा और मजदूर-किसान आंदोलन से जुड़े

लाहौर लौटने के बाद भगत सिंह ने युवाओं को संगठित करने के लिए नौजवान सभा के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1926 में वे सोहन सिंह जोश के संपर्क में आए और पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी से जुड़े। वह ‘कीर्ति’ पत्रिका के संपादकीय कार्य से भी जुड़े रहे। भगत सिंह पत्रकारिता को केवल समाचार माध्यम नहीं मानते थे, बल्कि विचारों और सामाजिक चेतना को जनता तक पहुंचाने का प्रभावी साधन समझते थे।

पुलिस कार्रवाई से बचना उनका अंतिम लक्ष्य नहीं था

1927 में क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े होने के संदेह में भगत सिंह पहली बार गिरफ्तार हुए। उन पर लाहौर के दशहरा मेले में हुए बम विस्फोट से जुड़े होने का आरोप भी लगाया गया था। बाद में जमानत पर उन्हें रिहा किया गया। वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज के बाद उनकी मृत्यु ने क्रांतिकारियों को झकझोर दिया। इसके बाद 17 दिसंबर 1928 को जे.पी. सॉन्डर्स की हत्या की गई, जिसमें भगत सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी। हालांकि वे पुलिस की गिरफ्त से बच निकले, लेकिन उनका उद्देश्य केवल छिपकर संघर्ष करना नहीं था।

विचारों और जनता से जुड़ने पर दिया जोर

भगत सिंह बेहद अध्ययनशील थे। वे नियमित रूप से पुस्तकालय जाते और विभिन्न राजनीतिक तथा सामाजिक विचारधाराओं का अध्ययन करते थे। समाजवाद से प्रभावित होने के बावजूद उन्होंने अपनी सोच को किसी एक पुस्तक या विचारक तक सीमित नहीं रखा। उनका मानना था कि क्रांति केवल हिंसक गतिविधियों का नाम नहीं है। उनके अनुसार वास्तविक क्रांति समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्था में बुनियादी बदलाव लाने की प्रक्रिया है।

असेंबली में बम फेंकने का मकसद क्या था?

क्रांतिकारियों ने महसूस किया कि केवल गुप्त कार्रवाइयों से जनता के बड़े हिस्से तक उनके विचार नहीं पहुंच पा रहे हैं। इसलिए उन्होंने केंद्रीय विधानसभा को अपने संदेश के लिए मंच बनाने का फैसला किया। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फेंका। बम इस तरह फेंका गया था कि किसी की जान न जाए। इसके साथ पर्चे भी बांटे गए, जिनका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार की नीतियों और दमनकारी कानूनों के खिलाफ जनता का ध्यान आकर्षित करना था।

गिरफ्तारी देकर क्रांतिकारी संदेश को बनाया हथियार

असेंबली में कार्रवाई के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने भागने के बजाय जानबूझकर गिरफ्तारी दी। उनका उद्देश्य अदालत को भी अपने विचारों के प्रचार का मंच बनाना था। वे यह दिखाना चाहते थे कि क्रांतिकारी केवल हिंसा करने वाले लोग नहीं हैं, बल्कि उनके पास देश और समाज के भविष्य को लेकर स्पष्ट राजनीतिक दृष्टिकोण भी है। इस कार्रवाई ने भगत सिंह को देशभर में बेहद लोकप्रिय बना दिया और उनका संदेश भारत से बाहर भी चर्चा में आया।

अदालत और जेल बने विचारों के मंच

भगत सिंह ने अदालत में अपने बचाव के बजाय ब्रिटिश शासन की नीतियों और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई। जेल में भी उनका अध्ययन जारी रहा। उन्होंने लंबी भूख हड़ताल के जरिए कैदियों के साथ होने वाले भेदभाव और अमानवीय व्यवहार का विरोध किया। जेल के दौरान उनकी छवि केवल हथियार उठाने वाले युवा क्रांतिकारी की नहीं रही, बल्कि एक गंभीर राजनीतिक विचारक के रूप में भी सामने आई।

शहादत से पहले भी नहीं डिगा उनका हौसला

भगत सिंह ने अपने मुकदमे में बचाव की कई संभावनाओं को स्वीकार नहीं किया। वे मानते थे कि क्रांतिकारियों का बलिदान उनके उद्देश्य को जनता तक पहुंचाने का माध्यम बन सकता है। उन्होंने अपने साथियों और करीबियों से भी कहा था कि उनका लक्ष्य व्यक्तिगत जीवन बचाना नहीं, बल्कि देश की आजादी और सामाजिक परिवर्तन के लिए संघर्ष करना है।

23 मार्च 1931 को दी गई सर्वोच्च कुर्बानी

23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई। कहा जाता है कि फांसी से कुछ समय पहले भी भगत सिंह अध्ययन में व्यस्त थे। उन्होंने लेनिन से संबंधित पुस्तक के बारे में जानकारी ली। अंतिम समय तक उनके चेहरे पर आत्मविश्वास और विचारों के प्रति दृढ़ता बनी रही। उनका संदेश ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ उनकी क्रांतिकारी चेतना का प्रतीक बन गया।

आज भी जिंदा है भगत सिंह की विचारधारा

भगत सिंह की शहादत को करीब एक सदी बीत चुकी है, लेकिन उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने युवाओं को केवल साहस का संदेश नहीं दिया, बल्कि पढ़ने, सवाल करने और सामाजिक व्यवस्था को समझने की प्रेरणा भी दी। उनका सपना ऐसा भारत था जहां स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकार न होकर सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और मानवीय गरिमा से भी जुड़ी हो। यही वजह है कि भगत सिंह आज भी भारत के युवाओं और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी प्रतीकों में शामिल हैं।

Read More  :  BJP Congress : राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर कसा तंज, जेपी नड्डा ने किया तीखा पलटवार