Bihar Election Funds : चुनावी चंदे में डूबीं बिहार की पार्टियां, खर्च का आंकड़ा देख उड़ जाएंगे होश

बिहार चुनाव फंडिंग को लेकर चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं, जहां राजनीतिक पार्टियों के खर्च का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। इस पूरे मामले ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है और कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर चुनावी चंदा कहां से आ रहा है और कैसे खर्च हो रहा है

Bihar Election Funds

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जून 17, 2026

Bihar Election Funds : एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की एक होश उड़ाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। इस रिपोर्ट में पिछले साल यानी 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों द्वारा जुटाए गए चंदे और उनके द्वारा किए गए खर्च का पूरा कच्चा चिट्ठा खोला गया है। चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन इनमें पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। एडीआर ने अपनी इस विशेष रिपोर्ट में चुनावी पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक दलों की वित्तीय गतिविधियों का विस्तृत विश्लेषण पेश किया है।

10 प्रमुख राजनीतिक दलों के खर्च का विश्लेषण

इस समीक्षा रिपोर्ट को तैयार करने के लिए एडीआर ने कुल 10 प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के चुनावी खर्च के ब्योरों का गहराई से अध्ययन किया। इनमें 5 राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां और 5 क्षेत्रीय स्तर की पार्टियां शामिल थीं। राष्ट्रीय दलों की सूची में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नाम थे। वहीं, बिहार की राजनीति में सक्रिय क्षेत्रीय दलों में राष्ट्रीय जनता दल (राजद), जनता दल यूनाइटेड (जदयू), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), एआईएमआईएम और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के खातों की जांच की गई।

चंदे की आमदनी और कुल खर्च में बड़ा अंतर

एडीआर के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन 10 राजनीतिक दलों ने बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कुल 281.323 करोड़ रुपये का चंदा (फंड) इकट्ठा किया था। इसके मुकाबले, सभी पार्टियों ने मिलकर कुल 193.466 करोड़ रुपये ही खर्च किए। इसका मतलब यह है कि राजनीतिक दलों द्वारा जुटाए गए कुल चंदे और उनके द्वारा घोषित किए गए आधिकारिक खर्च के बीच करीब 88 करोड़ रुपये का एक बड़ा अंतर देखने को मिला है। यह बची हुई रकम पार्टियों के पास सुरक्षित कोष में रह गई है।

चुनाव प्रचार और नेताओं की यात्राओं पर खर्च

राजनीतिक दलों की तिजोरी से सबसे ज्यादा पैसा जनता के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए निकाला गया। कुल चुनावी खर्च का सबसे बड़ा और मुख्य हिस्सा चुनाव प्रचार के काम में लगाया गया। सभी पार्टियों ने प्रचार-प्रसार के विभिन्न माध्यमों पर कुल 100.429 करोड़ रुपये खर्च किए, जो कि उनके कुल खर्च का लगभग 36.68 प्रतिशत बैठता है। इसके अलावा, चुनावी खर्च की दूसरी सबसे बड़ी मद नेताओं की यात्राएं रहीं। स्टार प्रचारकों और पार्टी के बड़े नेताओं को हवाई और सड़क मार्ग से रैलियों तक पहुँचाने के लिए 79.539 करोड़ रुपये (कुल खर्च का 29.05 प्रतिशत) खर्च किए गए। इसके साथ ही, उम्मीदवारों को सीधे एकमुश्त वित्तीय मदद के तौर पर 62.07 करोड़ रुपये बांटे गए।

वर्चुअल प्रचार और आपराधिक रिकॉर्ड के प्रकाशन पर जोर

आज के डिजिटल युग में वर्चुअल प्रचार का महत्व भी काफी बढ़ गया है। रिपोर्ट बताती है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए वोटरों को लुभाने के लिए पार्टियों ने 13.074 करोड़ रुपये का बजट खर्च किया। इसके साथ ही, चुनाव आयोग के कड़े निर्देशों का पालन करते हुए, सभी उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास या रिकॉर्ड को समाचार पत्रों और मीडिया में प्रकाशित करने के लिए भी 3.886 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके अलावा अन्य विविध कार्यों में 14.804 करोड़ रुपये का खर्च दर्ज किया गया है।

बसपा ने नहीं दी चुनावी फंड की कोई जानकारी

बिहार के इस चुनावी महासंग्राम में कुल मिलाकर 161 राजनीतिक पार्टियों ने अपनी किस्मत आजमाई थी। इनमें 6 राष्ट्रीय, 10 क्षेत्रीय और 145 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल शामिल थे। हालांकि, यह विश्लेषण सिर्फ उन्हीं 10 प्रमुख दलों पर आधारित था जिन्होंने अपने खर्च का विवरण चुनाव आयोग को सौंपा था। बेहद चौंकाने वाली बात यह रही कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इकलौती ऐसी राष्ट्रीय पार्टी थी, जिसने चुनाव के दौरान अपने केंद्रीय मुख्यालय या राज्य-इकाई स्तर पर जमा किए गए किसी भी चुनावी फंड या चंदे की जानकारी साझा नहीं की।

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