Bangladesh Election Rigging: बांग्लादेश चुनाव में धांधली का खुलासा, क्या मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में हुआ बड़ा खेल?

12 फरवरी 2026 को हुए बांग्लादेश के ऐतिहासिक चुनाव क्या महज एक दिखावा थे? बीएनपी की प्रचंड जीत और अवामी लीग के बहिष्कार के बीच धांधली की खबरों ने तूल पकड़ लिया है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार पर पक्षपात के आरोप लग रहे हैं। आखिर बंद कमरों में क्या खेल हुआ?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 17, 2026

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Bangladesh Election Rigging: बांग्लादेश में लोकतंत्र की बहाली के नाम पर हुए हालिया राष्ट्रीय चुनावों पर अब काले बादल मंडराने लगे हैं। 12 फरवरी को हुए मतदान में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने शानदार जीत दर्ज की, वहीं कट्टरपंथी दल जमात-ए-इस्लामी 68 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही। हालांकि, अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने इन चुनावों को ‘ऐतिहासिक और निष्पक्ष’ करार दिया था, लेकिन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल बांग्लादेश (TIB) की ताजा रिपोर्ट ने इन दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 40% संसदीय सीटों पर गंभीर अनियमितताएं पाई गई हैं।

उम्मीदवारों के आरोपों ने चुनाव आयोग को घेरे में लिया

TIB की रिपोर्ट महज एक सैद्धांतिक आंकलन नहीं है, बल्कि यह उन शिकायतों पर आधारित है जो सीधे तौर पर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों ने दर्ज कराई हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 28.6% सीटों पर उम्मीदवारों ने स्वयं धांधली और गड़बड़ी की आधिकारिक शिकायतें की हैं। भ्रष्टाचार निरोधक संस्था ने विशेष रूप से बांग्लादेश चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आयोग ने चुनावी शुचिता बनाए रखने के बजाय कुछ खास समूहों को लाभ पहुँचाने का काम किया, जिससे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता संदिग्ध हो गई है।

पर्यवेक्षकों की नियुक्ति में पक्षपात का बड़ा खुलासा

चुनावों की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ‘स्वतंत्र पर्यवेक्षक’ (Observers) की भूमिका सबसे अहम होती है। लेकिन TIB का आरोप है कि इस बार चुनाव आयोग ने उन संस्थानों और व्यक्तियों को पर्यवेक्षक के तौर पर पंजीकृत किया, जिनका सीधा संबंध राजनीतिक दलों से था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई अनुभवी और निष्पक्ष संस्थानों के आवेदनों को बार-बार खारिज कर दिया गया। इसके विपरीत, अंतरिम सरकार के सलाहकारों से जुड़े दो संस्थानों को तुरंत मंजूरी दे दी गई। यह स्पष्ट रूप से एकतरफा और भेदभावपूर्ण प्रक्रिया को दर्शाता है।

क्या विदेशी पर्यवेक्षकों की ‘वैधता’ खरीदी गई?

रिपोर्ट का सबसे विवादित हिस्सा ‘पेड ऑब्जर्वर्स’ से जुड़ा है। आलोचकों और TIB ने दावा किया है कि चुनाव आयोग ने विदेशी पर्यवेक्षकों को भुगतान किया। यह सीधे तौर पर ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) का मामला है। तर्क यह दिया जा रहा है कि जो पर्यवेक्षक उसी संस्था से पैसा ले रहे हैं जिसकी उन्हें निगरानी करनी है, वे निष्पक्ष रिपोर्ट कैसे दे सकते हैं? इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की चुनावी साख को गहरी चोट पहुँचाई है और सवाल खड़ा किया है कि क्या यह चुनाव की वैधता खरीदने की कोशिश थी?

संपत्ति के विवरण और चुनावी प्रतीकों पर विवाद

राजनीतिक दलों के पंजीकरण और उम्मीदवारों के हलफनामों की जांच में भी भारी खामियां पाई गई हैं। TIB ने सवाल उठाया है कि क्या उम्मीदवारों द्वारा घोषित आय और संपत्ति के स्रोतों का सही मायने में सत्यापन किया गया था? रिपोर्ट में अंदेशा जताया गया है कि कई उम्मीदवारों ने अपनी अवैध संपत्ति को छिपाया है। इसके अलावा, चुनाव चिह्नों के आवंटन को लेकर भी राजनीतिक दलों में भारी असंतोष देखा गया। आयोग पर आरोप है कि उसने जानबूझकर कुछ दलों को प्राथमिकता दी और दूसरों के लिए मुश्किलें खड़ी कीं।

लोकतंत्र के लिए भविष्य की चुनौतियां

बांग्लादेश में इस समय सत्ता परिवर्तन का दौर चल रहा है। ऐसे में चुनाव आयोग और अंतरिम सरकार पर लगे ये आरोप भविष्य की स्थिरता के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। यदि 40% सीटों पर गड़बड़ी की बात सच साबित होती है, तो नवनिर्वाचित सरकार की नैतिक वैधता पर सवाल उठते रहेंगे। जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी दलों का उभरना और चुनाव प्रक्रिया का संदिग्ध होना बांग्लादेश को एक नए राजनीतिक संकट की ओर धकेल सकता है।TIB की यह रिपोर्ट मोहम्मद यूनुस प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। अब देखना यह है कि क्या इन गड़बड़ियों की कोई स्वतंत्र जांच होगी या लोकतंत्र के नाम पर इन विसंगतियों को दबा दिया जाएगा।

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