Bangladesh Election 2026: क्या कट्टरपंथ की भेंट चढ़ जाएगा बांग्लादेश? चुनाव से पहले अल्पसंख्यकों पर हमले और जमात का बढ़ता कद

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद आज उस वक्त दहल उठी जब शहजाद टाउन के तरलाई इमामबाड़े में जुमे की नमाज अदा की जा रही थी। एक आत्मघाती हमलावर ने खुद को मस्जिद के भीतर उड़ा लिया, जिससे हर तरफ तबाही मच गई। आखिर सुरक्षा में कहां हुई चूक और कौन है इस हमले का मास्टरमाइंड?

Bangladesh Election 2026

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 6, 2026

Bangladesh Election 2026:  जैसे-जैसे बांग्लादेश 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों की ओर बढ़ रहा है, देश के भविष्य और विशेषकर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंताएं तेज हो गई हैं। हालिया अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों ने चेतावनी दी है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल अल्पसंख्यकों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। डर है कि चुनाव के बाद एक ऐसी सरकार सत्ता में आ सकती है, जो गैर-मुस्लिम समुदायों को समान नागरिक के रूप में अधिकार देने में विफल रहेगी। यह अनिश्चितता न केवल देश के आंतरिक ढांचे को कमजोर कर रही है, बल्कि दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रही है।

अंतरिम सरकार पर गंभीर आरोप: शांति के बजाय बढ़ाया ध्रुवीकरण

रिपोर्ट में मौजूदा अस्थिरता के लिए मुख्य रूप से मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया है। आरोप है कि यह सरकार एक निष्पक्ष और शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकाम रही है। इसके बजाय, प्रशासन पर आर्थिक अस्थिरता को बढ़ावा देने, बड़े कारोबारी समूहों के खिलाफ मनमानी कार्रवाई करने और बढ़ते कट्टरपंथ की ओर आंखें मूंदने के आरोप लगे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के बावजूद सरकार की चुप्पी ने सामाजिक ध्रुवीकरण को और अधिक गहरा कर दिया है।

अमेरिकी राजनयिक का लीक ऑडियो: जमात-ए-इस्लामी के साथ बढ़ती नजदीकी?

ब्रुसेल्स स्थित समाचार वेबसाइट ‘ईयू रिपोर्टर’ ने एक सनसनीखेज लीक ऑडियो का हवाला दिया है, जिसने कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। इस ऑडियो में ढाका में तैनात एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक को कथित तौर पर यह कहते हुए सुना गया है कि वे ‘जमात-ए-इस्लामी’ को बांग्लादेश का “मित्र” बनाना चाहते हैं। हालांकि कूटनीति में विभिन्न दलों से संवाद सामान्य है, लेकिन जमात जैसे कट्टरपंथी संगठन के प्रति अमेरिका का यह झुकाव कई सवाल खड़े करता है, क्योंकि रूस जैसे देश इसे पिछले दो दशकों से एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन मानते रहे हैं।

अंधेरे अतीत वाली जमात: कट्टरपंथ और हिंदू विरोधी हिंसा का इतिहास

जमात-ए-इस्लामी को बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा और कट्टरपंथी विचारधारा का मुख्य केंद्र माना जाता है। मुस्लिम ब्रदरहुड से प्रेरित इस संगठन की जड़ें 1971 के मुक्ति संग्राम के विरोध में रही हैं। उस समय इसके अर्धसैनिक गुटों पर निर्दोष नागरिकों के खिलाफ जघन्य अपराधों के आरोप लगे थे। रिपोर्ट के अनुसार, एक दशक पहले चुनावी पंजीकरण खोने के बावजूद, आज जमात देश का दूसरा सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दल बनकर उभरा है। यदि अमेरिका इस संगठन का समर्थन करता है, तो इसे हाल के वर्षों में उसकी विदेश नीति की सबसे बड़ी रणनीतिक चूक माना जाएगा।

प्रतिबंध हटने के बाद वापसी: अदालती फैसलों ने दी नई ताकत

साल 2024 में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद, एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से जमात पर लगा प्रतिबंध हटा लिया गया था। इसके बाद 2025 में अदालती आदेशों ने इसे दोबारा राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया। इस वापसी के बाद से ही देश में रूढ़िवादी इस्लामी विचारधारा का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। समाज में गहरा विभाजन पैदा हो गया है, जहाँ एक तरफ आधुनिकतावादी सोच है और दूसरी तरफ कट्टरपंथी धार्मिक एजेंडा।

सामाजिक पतन: महिलाओं और बच्चों के प्रति बढ़ती हिंसा

रिपोर्ट ने जुलाई 2024 के प्रदर्शनों के बाद के सामाजिक और नैतिक पतन पर भी रोशनी डाली है। जिस देश को शेख हसीना और खालिदा जिया जैसे महिला नेतृत्व के लिए जाना जाता था, वहाँ अब भीड़ द्वारा महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है। लड़कियों के खेल आयोजनों को रद्द किया जा रहा है और यौन हिंसा के मामलों में चिंताजनक वृद्धि हुई है।

स्थिरता की उम्मीदों पर फिरता पानी

धार्मिक आधार पर बंटा समाज, रोहिंग्या शरणार्थी संकट और भारत के साथ तनावपूर्ण संबंध—इन चुनौतियों के बीच होने वाले ये चुनाव शायद वह शांति न ला पाएं जिसकी नागरिक उम्मीद कर रहे हैं। बांग्लादेश एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ से उसकी दिशा या तो लोकतंत्र को मजबूत करेगी या उसे कट्टरपंथ की गहरी खाई में धकेल देगी।

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