Babri Masjid Controversy: ‘बाबर’ के नाम पर नहीं रुकेगा मस्जिद निर्माण, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की खारिज!

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में बन रही बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति को रोकने वाली याचिका को सुनने से साफ मना कर दिया है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि बाबर एक विदेशी आक्रांता था, इसलिए उसके नाम पर कोई इबादतगाह नहीं होनी चाहिए। जानिए कोर्ट ने 'तीन बार खारिज' कहकर क्या संदेश दिया।

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 20, 2026

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Babri Masjid Controversy:  देश की सर्वोच्च अदालत में हाल ही में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई थी, जिसमें मुगल आक्रांता बाबर के नाम पर किसी भी नए धार्मिक ढांचे या मस्जिद के निर्माण पर पूर्ण रोक लगाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि बाबर एक ‘हिंदू-विरोधी’ शासक था और उसके नाम पर मस्जिद बनाना करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने जैसा है। हालांकि, न्यायपालिका ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस याचिका पर विचार करने में असमर्थता जताई, जिसके बाद याचिकाकर्ता को अपना केस वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।

मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में ‘बाबरी’ का शिलान्यास

यह पूरा विवाद पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा से शुरू हुआ है। यहाँ भरतपुर से विधायक हुमायूं कबीर एक नई मस्जिद का निर्माण करा रहे हैं, जिसे उन्होंने ‘बाबरी मस्जिद’ का नाम दिया है। इस निर्माण को लेकर स्थानीय स्तर से लेकर नेशनल मीडिया तक में तीखी बहस छिड़ी हुई है। गौरतलब है कि हुमायूं कबीर ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि वे अयोध्या की विवादित ढांचा गिराए जाने की याद में इस मस्जिद का निर्माण करेंगे। उन्होंने 6 दिसंबर को लाखों लोगों की मौजूदगी में इस मस्जिद का शिलान्यास किया था, जिसे लेकर हिंदू संगठनों ने भारी विरोध दर्ज कराया है।

विधायक हुमायूं कबीर की घोषणा और निर्माण की शुरुआत

तृणमूल कांग्रेस से निलंबित रहने के दौरान हुमायूं कबीर ने इस प्रोजेक्ट को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस मस्जिद का निर्माण कार्य 11 फरवरी 2026 से औपचारिक रूप से शुरू हो चुका है। विधायक ने दावा किया है कि निर्माण कार्य में तेजी लाई जाएगी और अगले दो वर्षों के भीतर इस भव्य ढांचे को तैयार कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मस्जिद उनके संकल्प का हिस्सा है। हालांकि, उनके इस कदम को विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाला प्रयास करार दिया है।

याचिकाकर्ता के तर्क: “इतिहास की गलतियों को न दोहराया जाए”

सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका में वकील ने दलील दी थी कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ सांप्रदायिक शांति सर्वोपरि है। याचिका में कहा गया था कि बाबर के नाम पर धार्मिक स्ट्रक्चर बनाने का उद्देश्य केवल उकसावा और विवाद पैदा करना है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट को तुरंत एक्शन लेते हुए ऐसे किसी भी नामकरण पर रोक लगानी चाहिए जो ऐतिहासिक रूप से विवादित हो। वकील हुमायूं (याचिकाकर्ता के प्रतिनिधि) ने तर्क दिया कि यदि इस तरह के निर्माण को अनुमति दी गई, तो यह भविष्य में नए कानूनी और सामाजिक संकटों को जन्म दे सकता है।

कोर्ट की टिप्पणी और याचिका की वापसी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि वे इस तरह की याचिकाओं को सुनने के पक्ष में नहीं हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर विशेष ध्यान न देते हुए संकेत दिया कि यह मामला उनके क्षेत्राधिकार या जनहित याचिका के दायरे में फिट नहीं बैठता। जजों के कड़े रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी वापस लेना ही बेहतर समझा। इस कानूनी मोड़ के बाद अब बेलडांगा में मस्जिद का निर्माण बिना किसी न्यायिक रोक के जारी है, जिसने एक बार फिर देश में ‘बाबर’ बनाम ‘आस्था’ की बहस को हवा दे दी है।

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