Ram Mandir Donation Row: अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए एकत्रित चंदे में कथित गड़बड़ी और चोरी के मामले ने तूल पकड़ लिया है। इस मामले में राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन की शिकायत पर पुलिस ने 8 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की है। पुलिस की प्राथमिक जांच और एसआईटी (SIT) की रिपोर्ट के आधार पर इन आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। यह घटना मंदिर के चढ़ावे और दान राशि की सुरक्षा को लेकर कई बड़े सवाल खड़ा कर रही है।
अखिलेश यादव का BJP पर हमला
बताते चले कि, इस मामले को लेकर समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर तीखा प्रहार किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने तंज कसा, “बीजेपी राज में नाइंसाफ़ी की दिखेगी ये झांकी। फुनगी को फांसी, शाखाओं को मिलेगी माफी।” उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरी जांच प्रक्रिया में छोटे प्यादों को फंसाया जा रहा है, जबकि मुख्य जिम्मेदार लोगों को सुरक्षा कवच दिया जा रहा है।
SIT जांच और सबूतों के साथ छेड़छाड़ का संदेह
पूर्व सीएम ने एसआईटी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे ‘पूर्व-नियोजित’ करार दिया है। अखिलेश यादव का कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है कि एसआईटी को पहले ही एक स्क्रिप्ट थमा दी गई थी और उसी के अनुरूप जांच को मोड़ा गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच के बहाने उन सबूतों को मिटा दिया गया होगा जो बड़े चेहरों को बेनकाब कर सकते थे। उनके अनुसार, यह केवल एक दिखावे की कार्रवाई है ताकि जनता के आक्रोश को शांत किया जा सके।
ट्रस्ट के मुख्य पदाधिकारियों के नाम नदारद
इस एफआईआर की सबसे विवादित बात यह है कि इसमें राम मंदिर ट्रस्ट के किसी भी वरिष्ठ सदस्य का नाम शामिल नहीं है। नामजद आरोपियों में मुख्य रूप से चढ़ावे की गिनती करने वाले 6 कैशियर और ट्रस्ट के सदस्य चंपत राय के ड्राइवर टिन्नू यादव का नाम है। इनके अलावा अनुकल्प मिश्र, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय, मनीष यादव, लवकुश मिश्र, रमा शंकर मिश्र और सुभाष श्रीवास्तव को आरोपी बनाया गया है। ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों, जिन पर लगातार उंगलियां उठ रही हैं, उनका नाम एफआईआर में न होना विपक्ष के लिए बड़े संदेह का विषय है।
क्या निष्पक्ष जांच संभव है?
अखिलेश यादव के इस बयान ने मामले को राजनीतिक रंग दे दिया है। विपक्ष का तर्क है कि जब तक ट्रस्ट के बड़े पदों पर बैठे व्यक्तियों की भूमिका की जांच नहीं होगी, तब तक न्याय की उम्मीद बेमानी है। ट्रस्ट की ओर से खुद एफआईआर दर्ज कराने के बावजूद, उसमें नामजद लोगों की सूची यह स्पष्ट करती है कि अभी भी कई बड़े सवाल अनुत्तरित हैं। जनता और राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह जांच केवल छोटे स्तर के कर्मचारियों तक ही सीमित रहेगी या फिर इस गड़बड़ी के वास्तविक सूत्रधारों तक भी पहुंचेगी।










