Ayodhya Ram Mandir: अयोध्या के भव्य राम मंदिर में दान और चढ़ावे के कथित गबन का विवाद अब कानूनी लड़ाई में तब्दील हो गया है। एक तरफ जहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रामभक्तों को भरोसा दिलाते हुए 15 दिन का इंतजार करने और एसआईटी (SIT) जांच के जरिए ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ करने का दावा किया है, वहीं दूसरी तरफ यह पूरा मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की दहलीज पर पहुंच गया है। अदालत में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर पूरे प्रकरण की जांच के लिए उच्च स्तरीय न्यायिक आयोग के गठन की मांग की गई है।
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एसआईटी जांच पर सवाल
वकील मोती लाल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह जनहित याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता का सीधा आरोप है कि राज्य सरकार द्वारा गठित की गई एसआईटी (SIT) महज एक दिखावा है, जिसका उद्देश्य मामले के बड़े और रसूखदार चेहरों को बचाना है। वकील मोती लाल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि यह कोई सामान्य हेरफेर नहीं बल्कि एक बहुत बड़ा घोटाला है।
उन्होंने मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच के लिए तत्काल एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग का गठन किया जाए, जिसमें हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या सेवानिवृत्त जज शामिल हों। इसके साथ ही, जब तक इस पूरे मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक राम मंदिर ट्रस्ट की सभी प्रशासनिक शक्तियों और उनके बैंक खातों को तुरंत फ्रीज (सीज) कर दिया जाना चाहिए।
“चंपत राय और अनिल मिश्रा को बचाने की कोशिश”
याचिकाकर्ता ने आशंका जताई है कि एसआईटी जांच के जरिए केवल मंदिर में तैनात उन छोटे कर्मचारियों और लड़कों को बलि का बकरा बनाया जाएगा, जो वहां ₹10,000 से ₹12,000 की मामूली पगार पर काम कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रस्ट के मुख्य कर्ता-धर्ता चंपत राय और अनिल मिश्रा को बचाने का पुरजोर प्रयास किया जा रहा है, और नृपेन्द्र मिश्रा भी इस मामले में चंपत राय के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे हैं। याचिका में संतोष दुबे के दावों का हवाला देते हुए कहा गया है कि यह घोटाला ₹200 करोड़ से भी ज्यादा का है, जहां मंदिर का असली सोना चोरी करके उसकी जगह नकली (आर्टिफिशियल) सोना रख दिया गया है।
1250 पूजित शिलाएं गायब करने और जगन्नाथ मंदिर के फैसले का हवाला
मामले में एक और गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि मंदिर परिसर से भगवान राम के नाम की 1,250 पवित्र और पूजित शिलाएं या तो गायब कर दी गई हैं या फिर उन्हें अवैध रूप से बेच दिया गया है।
हाईकोर्ट में दायर इस याचिका में निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए अयोध्या के जिला जज को राम मंदिर का ‘रिसीवर’ नियुक्त करने की मांग की गई है। अपनी इस मांग के समर्थन में याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया है, जिसके तहत पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के प्रबंधन के लिए वहां के जिला जज को रिसीवर नियुक्त किया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई अगले हफ्ते होना तय हुई है।










