Ayatollah Ali Khamenei: मध्य पूर्व से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। ईरान की सरकारी मीडिया ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है। इस घटना ने क्षेत्र में एक भीषण युद्ध की नींव रख दी है। खामेनेई का निधन केवल एक नेता का जाना नहीं है, बल्कि एक ऐसे युग का अंत है जिसने पिछले 36 वर्षों से ईरान की दिशा तय की थी। उनका जीवन संघर्ष, कट्टर राजनीतिक रणनीति और सत्ता पर अटूट पकड़ की एक जटिल दास्तां रहा है।
संघर्षों से तपकर निकले ‘जीवित शहीद’ की छवि
अली खामेनेई का राजनीतिक सफर 1963 में शाह के शासन के दौरान शुरू हुआ, जहाँ उन्हें अपनी गतिविधियों के कारण जेल में अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद, वे उप रक्षा मंत्री बने और 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान सेना के बेहद करीब आ गए। जून 1981 में उन पर एक जानलेवा हमला हुआ, जब तेहरान की अबूजर मस्जिद में एक टेप रिकॉर्डर बम फटा। इस हमले में उनका दाहिना हाथ लकवाग्रस्त हो गया, लेकिन वे बच गए। इस घटना ने उन्हें जनता की नजरों में एक ‘जीवित शहीद’ बना दिया, जिससे उनकी राजनीतिक साख और मजबूत हो गई।
धार्मिक बाधाएं और रातों-रात अयातुल्ला बनने की कहानी
1989 में अयातुल्ला रूहोल्लाह खोमेनी की मृत्यु के बाद ईरान के सामने उत्तराधिकार का संकट था। खामेनेई उस समय तक ‘ग्रैंड अयातुल्ला’ या ‘मरजा-ए-तकलीद’ नहीं थे, जो सुप्रीम लीडर बनने के लिए अनिवार्य संवैधानिक योग्यता थी। हालांकि, सत्ता के समीकरणों को देखते हुए संविधान में रातों-रात बदलाव किए गए। योग्यता की शर्त को ‘धार्मिक पद’ से बदलकर ‘इस्लामी ज्ञान’ कर दिया गया। इस तरह, जो व्यक्ति कल तक ‘होज्जत-उल-इस्लाम’ था, उसे एक ही रात में ‘अयातुल्ला’ घोषित कर नया सुप्रीम लीडर चुन लिया गया।
सत्ता पर पकड़: सुरक्षा तंत्र और आर्थिक साम्राज्य ‘सेताद’
शुरुआत में खामेनेई को उनके गुरु खोमेनी की तुलना में कमजोर माना जाता था। अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए उन्होंने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और ‘बसीज’ जैसे अर्धसैनिक बलों का एक वफादार तंत्र खड़ा किया। जब भी उनकी सत्ता को चुनौती मिली, चाहे वह 2009 के चुनाव हों या 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हुए प्रदर्शन, उन्होंने इन बलों के जरिए विरोध को बेरहमी से कुचल दिया। इसके अतिरिक्त, ‘सेताद’ नामक अरबों डॉलर के आर्थिक साम्राज्य ने उन्हें वह वित्तीय ताकत दी, जिससे वे बिना किसी बाहरी निर्भरता के देश पर राज करते रहे।
पश्चिमी देशों से टकराव और ‘रणनीतिक लचीलापन’
खामेनेई हमेशा अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रति अविश्वासी रहे। उनका मानना था कि अमेरिका उनकी सरकार को उखाड़ फेंकना चाहता है। हालांकि, उन्होंने जरूरत पड़ने पर ‘हीरोइक फ्लेक्सिबिलिटी’ (लचीलापन) का भी सहारा लिया। 2015 का परमाणु समझौता इसी रणनीति का हिस्सा था, ताकि प्रतिबंधों से राहत पाकर अर्थव्यवस्था को संभाला जा सके। लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समझौते से हटने के बाद, खामेनेई ने फिर से कड़ा रुख अख्तियार कर लिया था, जो उनके जीवन के अंतिम समय तक जारी रहा।










