Assam UCC Bill Passed : असम की राजनीति और देश के कानूनी इतिहास में एक बेहद बड़ा और दूरगामी फैसला सामने आया है। असम विधानसभा ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) असम बिल 2026’ को पूर्ण बहुमत से पारित कर दिया है। इस नए कानून के पारित होने के साथ ही असम पूरे पूर्वोत्तर (नॉर्थ-ईस्ट) भारत का ऐसा पहला राज्य बन गया है, जिसने समान नागरिक संहिता को लागू करने का साहस दिखाया है। इसके साथ ही, राष्ट्रीय स्तर पर असम अब देश का तीसरा ऐसा राज्य बन गया है जहां यह कानून प्रभावी होगा। इस कानून के लागू होने के बाद राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, बच्चा गोद लेना, उत्तराधिकार, संपत्ति का बंटवारा और पारिवारिक विवादों से जुड़े तमाम कानूनी नियम पूरी तरह से एक समान हो जाएंगे।
अलग पर्सनल लॉ का खात्मा
असम में इस ऐतिहासिक कानून के अस्तित्व में आने के बाद अब विभिन्न धर्मों, जातियों और समुदायों के लिए सदियों से चले आ रहे अलग-अलग पर्सनल लॉ (व्यक्तिगत कानून) का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। उनकी जगह पर अब राज्य के प्रत्येक नागरिक पर एक ही धर्मनिरपेक्ष और समान कानून लागू होगा। असम सरकार का इस बिल को लेकर स्पष्ट तर्क है कि इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य समाज के सभी वर्गों, विशेषकर महिलाओं और वंचितों को समान अधिकार प्रदान करना है। इसके साथ ही, अलग-अलग पर्सनल लॉ के कारण पैदा होने वाली विसंगतियों को दूर कर पूरी कानूनी व्यवस्था को बेहद सरल, सुगम और पारदर्शी बनाना है।
कानून को लेकर राजनीतिक घमासान
जहां एक तरफ सत्ता पक्ष इस कानून को समाज सुधार की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ राज्य के मुख्य विपक्षी दलों और कई सामाजिक-धार्मिक संगठनों ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त की है। विपक्ष का आरोप है कि इस कानून को लागू करने में जल्दबाजी दिखाई गई है और इससे असम की विविध धार्मिक, जनजातीय और सांस्कृतिक परंपराओं पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। हालांकि, सरकार ने आश्वस्त किया है कि किसी भी समुदाय की अनूठी संस्कृति को ठेस नहीं पहुंचाई जाएगी। आपको बता दें कि असम से पहले देश में केवल उत्तराखंड और गोवा ही ऐसे राज्य थे जहां यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू था, और अब असम भी इस विशिष्ट सूची में शामिल हो गया है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का बयान
बिल के सफलतापूर्वक पास होने के बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य की जनता को बधाई दी और इसे असम के इतिहास का एक स्वर्णिम एवं ऐतिहासिक क्षण करार दिया। मुख्यमंत्री सरमा ने सोशल मीडिया और विधानसभा में दिए अपने बयान में कहा कि यह कानून राज्य में सामाजिक समानता, लैंगिक न्याय और मानवीय गरिमा को सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया सबसे बड़ा और निर्णायक कदम है। उन्होंने आगे कहा कि यह ऐतिहासिक फैसला भारत के महान राष्ट्र-निर्माताओं, दूरदर्शी संस्थापकों और संविधान निर्माताओं की मूल सोच तथा उनकी पवित्र इच्छा को धरातल पर उतारने और आगे बढ़ाने जैसा है।
तीन मुख्य संकल्पों को पूरा करता है यह कानून: चुनावी वादा हुआ सच
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस कानून के महत्व को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि यह ऐतिहासिक फैसला मुख्य रूप से तीन बेहद महत्वपूर्ण संकल्पों और आदर्शों को एक साथ पूरा करता है। पहला, यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 (आर्टिकल 44) में निहित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों की मूल भावना और आदर्शों का सम्मान करता है। दूसरा, यह भारतीय जनता पार्टी (BJP) के स्थापना काल से चले आ रहे वैचारिक सिद्धांतों को पूरा करता है। और तीसरा, यह बीजेपी असम द्वारा राज्य की जनता से किए गए प्रमुख चुनावी वादे की ससमय पूर्ति है। मुख्यमंत्री ने दृढ़ता से कहा कि सरकार ने जो वादा असम की जनता से किया था, उसे आज पूरी ईमानदारी के साथ निभा दिया गया है।
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