Assam Election 2026: असम की सियासत में वह सब कुछ घटित होने लगा है, जिसकी कल्पना मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने शायद ही की होगी। पिछले काफी समय से अंदरूनी कलह, गुटबाजी और नेताओं के दलबदल से जूझ रही असम कांग्रेस को लेकर कयास लगाए जा रहे थे कि क्या वह आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर दे पाएगी? लेकिन अब कांग्रेस (हाट शिबिर) ने एक ऐसा ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला है, जिसने राज्य के सियासी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। कांग्रेस ने असम के स्थानीय हितों की पैरोकार ‘रायजोर दल’ के साथ गठबंधन को अंतिम रूप दे दिया है, जो भाजपा के विजय रथ को रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
सीट शेयरिंग का पेच और प्रद्युत बरदालुई के जाने के बाद का समझौता
कांग्रेस और अखिल गोगोई की अगुवाई वाले रायजोर दल के बीच गठबंधन की राह आसान नहीं थी। शुरुआत में दोनों पार्टियों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर गहरा गतिरोध बना हुआ था। अखिल गोगोई कम से कम 15 सीटों की मांग पर अड़े थे, जबकि कांग्रेस 8-9 से ज्यादा सीटें छोड़ने को तैयार नहीं थी। एक समय तो ऐसा लगा कि यह गठबंधन टूट जाएगा और दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी भी शुरू कर दी थी। हालांकि, कांग्रेस सांसद प्रद्युत बरदालुई के पार्टी छोड़ने के बाद हालात रातों-रात बदल गए। इस झटके से संभलते हुए कांग्रेस ने लचीला रुख अपनाया और रायजोर दल को 11 सीटें देने पर सहमति जता दी। इसके अलावा, दो अन्य सीटों पर दोनों दल ‘फ्रेंडली फाइट’ करेंगे।
गौरव गोगोई के घर पर हुआ एलान: बढ़ सकता है BJP का ‘ब्लड प्रेशर’
गुरुवार रात जोरहाट में गौरव गोगोई के आवास पर आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस गठबंधन की औपचारिक घोषणा की गई। इस दौरान अखिल गोगोई ने स्पष्ट किया कि उनका लक्ष्य गौरव गोगोई को असम का अगला मुख्यमंत्री बनाना है। रायजोर दल और असम जातीय परिषद (AJP) जैसी क्षेत्रीय शक्तियों का कांग्रेस के साथ एक छत्र के नीचे आना भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय विपक्षी ताकत का यह मिलन मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की रणनीतियों पर पानी फेर सकता है और राज्य में सत्ता विरोधी लहर को हवा दे सकता है।
मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण और अजमल की पार्टी का सफाया
असम के चुनावी गणित में लगभग 40 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। हालांकि यह आबादी मुख्य रूप से 26 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है। अतीत में यह वोट बैंक कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की AIUDF के बीच बंट जाता था, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता था। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया कि अजमल की पार्टी का प्रभाव लगभग खत्म हो चुका है। वर्तमान परिस्थितियों में अल्पसंख्यक मतदाता पूरी तरह से कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद नजर आ रहे हैं। यह कांग्रेस के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है, जिससे वह अपनी लड़ाई को आगे बढ़ा सकती है।
भूमिपुत्रों के वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर: क्या पलटेगा गेम?
अल्पसंख्यक वोटों को सुरक्षित करने के बाद अब कांग्रेस की नजर ‘असमिया भूमिपुत्रों’ के वोटों पर है। वर्तमान में असम गण परिषद (AGP) के साथ गठबंधन के कारण यह वोट बैंक काफी हद तक भाजपा के पाले में है। हालांकि, अखिल गोगोई और असम जातीय परिषद के कांग्रेस के साथ जुड़ने से स्थिति बदल सकती है। गौरव गोगोई को मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में आगे बढ़ाकर कांग्रेस स्थानीय भावनाओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। यदि क्षेत्रीय अस्मिता और विकास का यह संगम काम कर गया, तो असम में सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।









