US-Iran Talks: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित उच्च स्तरीय शांति वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई है। इस कूटनीतिक विफलता के बाद अब पाकिस्तान सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है, जिसमें भविष्य की अनिश्चितताओं को लेकर चिंता व्यक्त की गई है।
पाकिस्तान की पहली प्रतिक्रिया
बताते चले कि, इस्लामाबाद में बातचीत के बेनतीजा रहने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। डार ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान ने दोनों देशों को एक मेज पर लाने और क्षेत्रीय शांति स्थापित करने के लिए हर संभव प्रयास किए। उन्होंने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान की प्राथमिकता वर्तमान में लागू संघर्ष विराम (Ceasefire) की समय सीमा को बढ़ाना है, ताकि बातचीत के लिए अनुकूल माहौल बना रहे। विदेश मंत्री ने उम्मीद जताई कि अमेरिका और ईरान संयम बरतेंगे और युद्धविराम का पालन करेंगे, क्योंकि पाकिस्तान भविष्य में भी मध्यस्थ (Mediator) की भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।
यूरेनियम संवर्धन और जीरो एनरिचमेंट नीति पर अमेरिका का रुख
सूत्रों के अनुसार, इस वार्ता के विफल होने का मुख्य कारण अमेरिका द्वारा रखी गई अत्यंत कठोर शर्तें थीं। जो बाइडन प्रशासन ने ईरान के सामने परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) को लेकर स्पष्ट रुख अपनाते हुए ‘जीरो एनरिचमेंट’ की मांग रखी। अमेरिका ने शर्त रखी कि ईरान को अपना यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करना होगा। इतना ही नहीं, अमेरिका ने यह मांग भी दोहराई कि ईरान अपने कब्जे में मौजूद लगभग 900 पाउंड यूरेनियम भंडार को देश की सीमा से बाहर भेजे। इन शर्तों ने तेहरान को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ की सुरक्षा और वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट
परमाणु मुद्दों के अलावा, समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण को लेकर भी दोनों पक्ष आपस में भिड़ गए। अमेरिका ने दो-टूक शब्दों में कहा कि वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ (Strait of Hormuz) की सुरक्षा का पूर्ण नियंत्रण अपने पास रखना चाहता है। गौरतलब है कि यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए जीवन रेखा माना जाता है, क्योंकि दुनिया के तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा यहीं से गुजरता है। अमेरिका के इस सामरिक वर्चस्व (Strategic Dominance) के प्रस्ताव को ईरान ने अपनी संप्रभुता के खिलाफ माना, जिससे बातचीत की रही-सही उम्मीदें भी खत्म हो गई।
40 दिनों की शांति के बाद फिर मंडरा रहे हैं युद्ध के बादल
लगभग 40 दिनों के सीजफायर के बाद आयोजित इस वार्ता के टूटने से अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों में गहरी चिंता है। हालांकि वर्तमान में गोलीबारी रुकी हुई है, लेकिन कूटनीतिक विफलता यह संकेत दे रही है कि यह अस्थायी शांति (Temporary Peace) लंबे समय तक नहीं टिक पाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही किसी नए समझौते पर सहमति नहीं बनी, तो पश्चिम एशिया में एक बार फिर सैन्य टकराव (Military Conflict) की स्थिति पैदा हो सकती है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर पड़ना तय है।










