Sambhal Namaz Dispute: इलाहाबाद हाई कोर्ट की अधिकारियों को कड़ी फटकार, ‘इस्तीफा दें या तबादला कराएं’

संभल नमाज विवाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रशासन की चूलें हिला दी हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अगर अधिकारी व्यवस्था नहीं संभाल सकते तो उन्हें पद पर रहने का कोई हक नहीं। क्या इस सख्त टिप्पणी के बाद संभल के आला अधिकारियों का पत्ता साफ होने वाला है?

Sambhal Namaz Dispute

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मार्च 14, 2026

Sambhal Namaz Dispute:  उत्तर प्रदेश के संभल में रमजान के पवित्र महीने के दौरान नमाज को लेकर चल रहे विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। स्थानीय प्रशासन द्वारा मस्जिद में नमाजियों की संख्या सीमित करने के फैसले पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए साफ कहा कि किसी भी समुदाय को उनके निर्धारित पूजा स्थल पर प्रार्थना करने से नहीं रोका जा सकता। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाए। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने में अक्षम है, तो उन्हें अपने पद पर रहने का कोई हक नहीं है। यह मामला अब क्षेत्र में चर्चा का केंद्र बन गया है।

‘इस्तीफा दीजिए या तबादला करवा लीजिए’: कोर्ट की सीधी चेतावनी

सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस अधीक्षक (SP) और जिलाधिकारी (DM) को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य का प्राथमिक कर्तव्य कानून का राज स्थापित करना है। खंडपीठ ने कहा, “यदि स्थानीय अधिकारियों को लगता है कि वे कानून-व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित नहीं कर सकते और इसी डर से वे नमाजियों की संख्या पर अंकुश लगाना चाहते हैं, तो उन्हें या तो अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए या फिर जिले से अपना तबादला करवा लेना चाहिए।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों की विफलता का खामियाजा नागरिकों को उनके धार्मिक अधिकारों की कटौती के रूप में नहीं भुगतना चाहिए।

निजी संपत्ति और सार्वजनिक भूमि पर पूजा के नियम

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में राज्य के हस्तक्षेप की सीमाओं को भी रेखांकित किया। खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई धार्मिक स्थल किसी निजी संपत्ति पर स्थित है, जैसा कि इस मामले में पहले ही तय किया जा चुका है, तो वहां पूजा या नमाज के लिए सरकार से किसी पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य का हस्तक्षेप केवल तभी उचित और अनिवार्य होता है जब धार्मिक कार्यक्रम सार्वजनिक भूमि पर आयोजित किए जा रहे हों या वे सार्वजनिक संपत्ति तक फैल रहे हों। निजी परिसर के भीतर इबादत करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है।

मालिकाना हक और नमाजियों की संख्या का विवाद

यह मामला याचिकाकर्ता मुनाजिर खान द्वारा दायर की गई ‘रिट C’ याचिका से संबंधित है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि उन्हें गाटा संख्या 291 पर नमाज अदा करने से रोका जा रहा है। हालांकि, राज्य सरकार ने राजस्व रिकॉर्ड पेश करते हुए दावा किया कि यह जमीन मोहन सिंह और भूरज सिंह के नाम पर दर्ज है। सरकार की दलील थी कि कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए केवल 20 लोगों को ही नमाज की अनुमति दी गई है। इसके विपरीत, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि रमजान का महीना होने के कारण परिसर में नमाजियों की संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है और उन्हें रोकना गलत है।

अगली सुनवाई 16 मार्च को: सबूतों के साथ पेश होने का आदेश

कोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों को फिलहाल खारिज कर दिया है, लेकिन मामले की गहराई तक जाने के लिए याचिकाकर्ता को पूरक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ता को उस स्थान की स्पष्ट तस्वीरें और संबंधित राजस्व दस्तावेज पेश करने होंगे, जहां नमाज अदा की जानी है। राज्य सरकार ने भी निर्देश लेने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की है। अब इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च 2026 को होगी। अदालत के इस सख्त रुख ने यह संदेश दिया है कि प्रशासनिक अक्षमता के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन स्वीकार्य नहीं होगा।

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