UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में सार्वजनिक स्थानों पर नमाज अदा करने को लेकर एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सार्वजनिक संपत्तियों (Public Properties) पर समाज के हर नागरिक का समान अधिकार होता है। किसी भी एक समुदाय या व्यक्ति द्वारा इसका एकतरफा उपयोग कानूनी रूप से मान्य नहीं है। इस फैसले पर अब मुस्लिम समाज के प्रतिष्ठित विद्वानों और धर्मगुरुओं की सकारात्मक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख
बताते चले कि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Religious Freedom) असीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरों के अधिकारों के अधीन है। अदालत के अनुसार, किसी भी धर्म का पालन इस तरह नहीं किया जा सकता कि वह आम जनता के अधिकारों में हस्तक्षेप करे या यातायात और सुरक्षा में बाधा उत्पन्न करे। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई भूमि विवादित है या सार्वजनिक उपयोग के लिए है, तो वहां एकतरफा धार्मिक गतिविधियों की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी का समर्थन
आपको बता दे कि, हाईकोर्ट की इस टिप्पणी का ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने अदालत के निर्णय को ‘जायज’ ठहराते हुए कहा कि इस्लामी शरियत (Islamic Sharia) भी यही सिखाती है कि नमाज ऐसी जगह न पढ़ी जाए जहां कोई विवाद, तनाव या किसी को आपत्ति हो। मौलाना ने स्पष्ट किया कि इस्लाम का मूल उद्देश्य किसी को तकलीफ देना नहीं है, बल्कि यह सबके लिए रहम और शांति का संदेश देता है।
ट्रैफिक और आम आवाजाही में बाधा न बनने की अपील
सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ने से होने वाली व्यावहारिक समस्याओं पर चर्चा करते हुए मौलाना रजवी ने कहा कि सड़कों या फुटपाथों पर ट्रैफिक और लोगों का आना-जाना लगा रहता है। ऐसी जगहों पर इबादत करने से न केवल आम जनता को समस्या होती है, बल्कि नमाज अदा करने वाला (Worshipper) भी डिस्टर्ब होता है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय से अपील की कि वे अपनी इबादत मस्जिदों, घरों या अपनी निजी दुकानों के भीतर ही करें, ताकि नमाज की गरिमा और अहमियत बनी रहे और समाज में सद्भाव बना रहे।
अन्य मुस्लिम स्कॉलर्स की राय
अदालत के इस फैसले पर एक अन्य मुस्लिम धर्मगुरु चौधरी इफराहीम हुसैन ने भी अपनी मुहर लगाई है। उन्होंने इस निर्णय को ‘सराहनीय’ बताते हुए कहा कि यह कानून और व्यवस्था को बनाए रखने की दिशा में एक सही कदम है। मुस्लिम स्कॉलर्स का मानना है कि इस तरह की स्पष्टता से भविष्य में होने वाले सांप्रदायिक तनावों को रोकने में मदद मिलेगी। अदालत ने अंत में यह भी स्पष्ट किया कि भले ही कोई भूमि निजी होने का दावा करे, लेकिन अगर उससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होती है, तो वहां सामूहिक इबादत की राहत नहीं दी जा सकती।










