UP News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर हलचल तेज हो गई है। एक ओर बीजेपी अपनी चुनावी बिसात बिछाने में जुटी है, तो दूसरी ओर ‘इंडिया’ गठबंधन के सहयोगियों—समाजवादी पार्टी और कांग्रेस—के बीच खटास की खबरें सामने आ रही हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में कांग्रेस की चुनावी तैयारियों पर सवाल उठाए थे, जिसे लेकर सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने नाराजगी जाहिर की है। मसूद ने पलटवार करते हुए कहा कि यदि अखिलेश यादव को कांग्रेस कमजोर लगती है, तो उन्हें अकेले चुनाव लड़कर अपनी ताकत परख लेनी चाहिए। यह तल्खी गठबंधन के भविष्य पर कई सवाल खड़े कर रही है।
मुस्लिम मुद्दों पर सपा की चुप्पी को लेकर कांग्रेस का बड़ा आरोप
बताते चले कि, इमरान मसूद ने केवल चुनावी तैयारियों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने समाजवादी पार्टी के नेतृत्व पर गंभीर आरोप भी लगाए। मसूद का दावा है कि देश में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार और मस्जिदों के खिलाफ हो रही कार्रवाई जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अखिलेश यादव की चुप्पी चिंताजनक है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा नेतृत्व इन विषयों पर कोई स्पष्ट रुख नहीं अपना रहा है, जिससे समुदाय में असंतोष है। यह बयान सपा-कांग्रेस के बीच बढ़ती वैचारिक दूरी और राजनीतिक अविश्वास को उजागर करता है, जो आने वाले समय में गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
403 सीटों पर कांग्रेस की आत्मनिर्भर नीति और गठबंधन की भविष्य की राह
आगामी यूपी विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की रणनीति पर बात करते हुए सांसद इमरान मसूद ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी राज्य की सभी 403 सीटों पर अपनी तैयारी कर रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कांग्रेस अकेले दम पर भी चुनाव मैदान में उतरने को पूरी तरह तैयार है।इमरान मसूद ने अखिलेश यादव को पश्चिम बंगाल के राजनीतिक घटनाक्रम से सीख लेने की नसीहत भी दी। हालांकि, इस तीखेपन के बावजूद उन्होंने ‘इंडिया’ गठबंधन के प्रति सकारात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि गठबंधन के सभी दल अभी भी एक साथ हैं और इसे और अधिक मजबूत बनाने के प्रयास जारी रहेंगे।
कैसे हुई इस पूरे विवाद की शुरुआत ?
पूरे विवाद की शुरुआत अखिलेश यादव के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस और सपा दोनों ही 403 सीटों पर तैयारी कर रही हैं। उन्होंने स्वीकार किया था कि दोनों दल साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे, लेकिन कांग्रेस की ओर से जितनी तैयारी होनी चाहिए, वह फिलहाल दिखाई नहीं दे रही है। यह बयान सपा की ‘बड़े भाई’ वाली भूमिका को दर्शाता है। अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह है कि क्या यह महज सीटों के तालमेल की शुरुआती नोक-झोंक है या फिर 2027 के महासंग्राम से पहले गठबंधन में दरार के संकेत। दोनों दलों के बीच का यह वाकयुद्ध आगामी दिनों में गठबंधन के स्वरूप को और अधिक स्पष्ट करेगा।










