Abu Dhabi Peace Talks: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप की धरती पर लड़ी जा रही सबसे भीषण और घातक जंग को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं। संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में आयोजित दो दिवसीय शांति वार्ता का दूसरा दौर गुरुवार को संपन्न हुआ। हालांकि, इस बैठक से किसी बड़े शांति समझौते की घोषणा नहीं हुई, लेकिन महीनों के गतिरोध के बाद कीव और मॉस्को के वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडलों का एक मेज पर बैठना खुद में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। कूटनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को युद्ध समाप्ति की दिशा में एक ‘नई और ठोस शुरुआत’ के रूप में देखा जा रहा है।
बड़ा मानवीय परिणाम: 314 युद्धबंदियों की घर वापसी पर बनी सहमति
इस वार्ता का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक परिणाम युद्धबंदियों की अदला-बदली के रूप में सामने आया है। लंबी चर्चा के बाद दोनों पक्ष एक-दूसरे के 157-157 कैदियों (कुल 314) को रिहा करने पर सहमत हुए। रूसी रक्षा मंत्रालय ने रिहा किए गए सैनिकों की तस्वीरें जारी की हैं, जिनमें उन्हें बसों में सवार होकर अपने वतन लौटते देखा जा सकता है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने इस कदम का स्वागत करते हुए इसे एक ‘सकारात्मक परिणाम’ बताया। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रूस के साथ सीधी बातचीत करना कभी भी आसान नहीं रहा है और कइयों की रिहाई अब भी शेष है।
अमेरिकी मध्यस्थता और तकनीकी सैन्य टीमों का आमना-सामना
इस शांति प्रयास में अमेरिका की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने इस बैठक में सक्रिय भागीदारी निभाई। विटकॉफ ने वार्ता के बाद संतुलित बयान देते हुए कहा कि अभी भी आने वाले हफ्तों में बहुत महत्वपूर्ण कार्य शेष है, जिससे उन्होंने तत्काल पूर्ण शांति की उम्मीदों को फिलहाल कम रखा है। वहीं, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि पहली बार रूस और यूक्रेन की ‘तकनीकी सैन्य टीमें’ इस प्रारूप में आमने-सामने बैठीं। यह संकेत देता है कि बातचीत अब केवल राजनीतिक स्तर पर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकतों को सुलझाने की दिशा में भी बढ़ रही है।
क्षेत्रीय स्वायत्तता पर गहरा मतभेद: डोनबास बना शांति की राह में रोड़ा
इतने प्रयासों के बावजूद, शांति समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा मॉस्को की क्षेत्रीय मांगें हैं। क्रेमलिन ने अपना रुख साफ कर दिया है कि किसी भी स्थाई समझौते के लिए यूक्रेन को पूरे पूर्वी डोनबास क्षेत्र पर रूस का अधिकार स्वीकार करना होगा। दूसरी ओर, यूक्रेनी अधिकारियों ने इन शर्तों को सिरे से खारिज कर दिया है। यूक्रेन वर्तमान ‘फ्रंटलाइन’ पर ही युद्धविराम चाहता है ताकि और अधिक भूमि न खोनी पड़े। व्लादिमीर पुतिन ने संकेत दिए हैं कि यदि उनकी कड़ी शर्तें नहीं मानी गईं, तो वे इस संघर्ष को लंबे समय तक खींचने की क्षमता रखते हैं।
ऊर्जा संकट और जमीनी संघर्ष: उपयोगी रही त्रिपक्षीय वार्ता
यह बातचीत एक ऐसे संवेदनशील समय में हो रही है जब रूस ने यूक्रेन के ऊर्जा बुनियादी ढांचे (पावर ग्रिड) पर हमले तेज कर दिए हैं, जिससे यूक्रेन का एक बड़ा हिस्सा कड़ाके की ठंड में अंधेरे में डूब गया है। हालांकि, यूक्रेनी सेना के कड़े प्रतिरोध के कारण रूसी सेना की जमीनी बढ़त पिछले वर्ष की तुलना में धीमी पड़ गई है। यूक्रेन के सैन्य खुफिया प्रमुख किरिलो बुडानोव ने इस त्रिपक्षीय वार्ता (रूस, यूक्रेन और अमेरिका) को ‘वास्तव में उपयोगी’ करार दिया है। उन्होंने भविष्य में भी इस तरह के संवाद को जारी रखने पर बल दिया है ताकि मानवीय क्षति को कम किया जा सके।
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