सांसदों के टूटने से AAP संकट में, संसद में NDA को मिला रणनीतिक बढ़त

नई दिल्ली आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए ये हफ्ता किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा. सात दिनों के अंदर पार्टी ने राज्यसभा में अपने 10 में से 7 सांसदों को खो दिया. इसे एक सोचा-समझा राजनीतिक ऑपरेशन बताया जा रहा है. इसकी वजह से संसद में सियासत का गणित पूरा तरह बदल गया है. बुधवार, 22 अप्रैल की सुबह जब अरविंद केजरीवाल को इस तरह के किसी कदम अंदेशा हुआ, तो उन्होंने तुरंत अपने सांसदों को फोन मिलाना शुरू किया. कुछ ने फोन उठाए, कुछ ने गोल-मोल जवाब दिए और कुछ ने फोन ही नहीं उठाए. केजरीवाल शुक्रवार

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Published On :

अप्रैल 27, 2026

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नई दिल्ली

आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए ये हफ्ता किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा. सात दिनों के अंदर पार्टी ने राज्यसभा में अपने 10 में से 7 सांसदों को खो दिया. इसे एक सोचा-समझा राजनीतिक ऑपरेशन बताया जा रहा है. इसकी वजह से संसद में सियासत का गणित पूरा तरह बदल गया है.

बुधवार, 22 अप्रैल की सुबह जब अरविंद केजरीवाल को इस तरह के किसी कदम अंदेशा हुआ, तो उन्होंने तुरंत अपने सांसदों को फोन मिलाना शुरू किया. कुछ ने फोन उठाए, कुछ ने गोल-मोल जवाब दिए और कुछ ने फोन ही नहीं उठाए.

केजरीवाल शुक्रवार सुबह तक संदीप पाठक को फोन करते रहे और उन्हें भरोसा दिया गया कि पाठक उनके ही साथ हैं. लेकिन शुक्रवार दोपहर तक पाठक सीधे बीजेपी मुख्यालय पहुंच गए और सत्ताधारी पार्टी का दामन थाम लिया.

पहले आप सांसदों का विलय सोमवार, 27 अप्रैल को होना था. गृह मंत्री पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार से लौटकर सभी सांसदों से मिलने वाले थे. लेकिन फिर बीजेपी को पता चला कि केजरीवाल को इस साजिश की भनक लग गई है और वो सांसदों को मनाने की कोशिश में जुट गए हैं. ऐसे में इस 'ऑपरेशन' की तारीख बदल दी गई और शाह की गैर-मौजूदगी में ही शुक्रवार को मिशन को अंजाम दे दिया गया.

इस ऑपरेशन के मुख्य किरदार

1. राघव चड्ढा: पर्दे के पीछे के रणनीतिकार
राघव चड्ढा इस पूरे ऑपरेशन के फील्ड कमांडर बताए जा रहे हैं. शराब नीति मामले के बाद से ही वो पार्टी से दूरी बनाए हुए थे. लंदन में उनकी आंखों की सर्जरी के दौरान ही बीजेपी से बातचीत का रास्ता साफ हुआ. वापस आकर उन्होंने एक-एक करके दूसरे सांसदों को भरोसे में लिया.

2. संदीप पाठक: सबसे बड़ा झटका
संदीप पाठक वो शख्स हैं जिन्होंने पंजाब में AAP की ऐतिहासिक जीत की नींव रखी थी. केजरीवाल को सबसे ज्यादा दुख पाठक के जाने का हुआ क्योंकि वो आखिरी मिनट तक केजरीवाल को वफादारी का भरोसा दिलाते रहे और फिर सीधे राघव चड्ढा के साथ बीजेपी में शामिल हो गए.

3. हरभजन सिंह: पहले ही तय था रुख
पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह का जाना चौंकाने वाला नहीं था. सूत्रों के मुताबिक, उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान ही BCCI से आए एक फोन ने उनका रुख साफ कर दिया था. वो पहले से ही बीजेपी के प्रभाव क्षेत्र में थे.

4. उद्योगपति सांसदों की 'मजबूरी'
राजिंदर गुप्ता (ट्राइडेंट ग्रुप), विक्रमजीत साहनी और अशोक मित्तल (LPU) जैसे सांसदों का आधार राजनीति से ज्यादा व्यापार था. अशोक मित्तल के संस्थानों पर विलय से ठीक 9 दिन पहले ED की छापेमारी हुई थी. इन सांसदों के लिए केंद्र सरकार के साथ चलना एक व्यावसायिक जरूरत भी थी.

बीजेपी को क्या मिला?
राजनीतिक रूप से पंजाब में बीजेपी को शायद तुरंत बड़ा फायदा न मिले, क्योंकि इनमें से ज्यादातर सांसद जमीनी नेता नहीं हैं. लेकिन संसदीय गणित में बीजेपी को बंपर जीत मिली है:

बीजेपी सांसदों की संख्या 113 पहुंच गई है और NDA ने पहली बार राज्यसभा में साधारण बहुमत पार कर लिया है. अब सरकार को 'वन नेशन वन इलेक्शन' जैसे बड़े बिल पास कराने के लिए क्षेत्रीय दलों के समर्थन की जरूरत नहीं पड़ेगी. विपक्ष अब राज्यसभा में बिलों को नहीं रोक पाएगा.

शुक्रवार शाम तक AAP के पास राज्यसभा में सिर्फ 3 सांसद (संजय सिंह, एनडी गुप्ता और बलबीर सिंह सीचेवाल) रह गए. केजरीवाल ने इसे पंजाबियों के साथ धोखा बताया, लेकिन बीजेपी के लिए 2027 के पंजाब मिशन का असली खेल अब शुरू हुआ है.

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