जगन्नाथ संस्कृति की अनूठी परंपरा, हेरा पंचमी में दिखेगा देवी लक्ष्मी का मान

खरसावां  जगन्नाथ संस्कृति में रथयात्रा केवल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की यात्रा भर नहीं है, बल्कि इससे जुड़े प्रत्येक अनुष्ठान की अपनी अलग धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता है. इन्हीं में से एक है हेरा पंचमी, जो रथयात्रा के पांचवें दिन मनायी जाती है. इस दिन देवी महालक्ष्मी के मान-मनौव्वल और भगवान जगन्नाथ के प्रति उनके स्नेह व नाराजगी को अनूठे धार्मिक अनुष्ठान के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है. ओड़िशा के श्रीजगन्नाथ पुरी की तर्ज पर सरायकेला, खरसावां और हरिभंजा में भी सोमवार की रात श्रद्धा और परंपरा के साथ रथ भंगिनी की रस्म निभायी जायेगी. महालक्ष्मी पहुंचेंगी गुंडिचा

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Published On :

जुलाई 20, 2026

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खरसावां
 जगन्नाथ संस्कृति में रथयात्रा केवल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की यात्रा भर नहीं है, बल्कि इससे जुड़े प्रत्येक अनुष्ठान की अपनी अलग धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता है. इन्हीं में से एक है हेरा पंचमी, जो रथयात्रा के पांचवें दिन मनायी जाती है. इस दिन देवी महालक्ष्मी के मान-मनौव्वल और भगवान जगन्नाथ के प्रति उनके स्नेह व नाराजगी को अनूठे धार्मिक अनुष्ठान के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है. ओड़िशा के श्रीजगन्नाथ पुरी की तर्ज पर सरायकेला, खरसावां और हरिभंजा में भी सोमवार की रात श्रद्धा और परंपरा के साथ रथ भंगिनी की रस्म निभायी जायेगी.

महालक्ष्मी पहुंचेंगी गुंडिचा मंदिर, तोड़ेंगी नंदिघोष रथ का पहिया
हेरा पंचमी के अवसर पर सोमवार की शाम माता लक्ष्मी की कांस्य प्रतिमा को श्रीमंदिर स्थित लक्ष्मी मंदिर से विशेष पालकी (विमान) में विराजमान कर गुंडिचा मंदिर तक शोभायात्रा निकाली जायेगी. मंदिर के मुख्य द्वार पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना और परंपरागत संवाद के बाद देवी महालक्ष्मी प्रभु जगन्नाथ के रथ नंदिघोष के समीप पहुंचेंगी. यहां नाराजगी के प्रतीक स्वरूप रथ के अगले हिस्से की लकड़ी और पहिये को प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त किया जायेगा. इसी धार्मिक अनुष्ठान को रथ भंगिनी कहा जाता है. इसके बाद सेवायत और पुजारी माता लक्ष्मी का मान-मनौव्वल कर उन्हें पुनः श्रीमंदिर ले जायेंगे.

मां लक्ष्मी के भक्त निभाते हैं प्रमुख भूमिका
रथ भंगिनी अनुष्ठान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भगवान जगन्नाथ के सेवकों की अपेक्षा मां लक्ष्मी के भक्तों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है. बड़ी संख्या में महिलाएं इस अनुष्ठान में शामिल होती हैं. लक्ष्मी मंदिर में विशेष पूजा के बाद भक्त पालकी में विराजमान माता की प्रतिमा को लेकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं. मंदिर के चौखट पर दस्तक देने की परंपरा निभाने के बाद सभी धार्मिक विधियां पूरी की जाती हैं. इसके पश्चात श्रद्धालु माता लक्ष्मी की प्रतिमा को नंदिघोष रथ तक ले जाकर रथ की लकड़ियों को प्रतीकात्मक रूप से तोड़ते हैं और फिर माता को पुनः उनके मंदिर में स्थापित किया जाता है.

पति की बेरुखी पर नाराज होती हैं महालक्ष्मी
हेरा पंचमी की परंपरा भगवान जगन्नाथ और देवी महालक्ष्मी से जुड़ी एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा पर आधारित है. मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मौसी घर स्थित गुंडिचा मंदिर चले जाते हैं और पांच दिन बीत जाने के बाद भी वापस नहीं लौटते. इससे देवी महालक्ष्मी अत्यंत नाराज हो जाती हैं. वह स्वयं पालकी में सवार होकर गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं और भगवान जगन्नाथ से अपनी नाराजगी व्यक्त करती हैं. भगवान उन्हें शीघ्र लौटने का आश्वासन देते हैं, लेकिन क्रोधित महालक्ष्मी उनके रथ नंदिघोष के एक हिस्से को तोड़कर अपनी नाराजगी प्रकट करती हैं. इसके बाद वह श्रीमंदिर लौट जाती हैं.

पुजारियों के माध्यम से ओडिया भाषा में होता है मान-मनौव्वल
इस अनुष्ठान में भगवान जगन्नाथ और देवी महालक्ष्मी के बीच संवाद सीधे नहीं, बल्कि उनके पुजारियों के माध्यम से होता है. स्थानीय ओड़िया परंपरा के अनुसार दोनों पक्षों के सेवायत निर्धारित संवाद का आदान-प्रदान करते हैं. इसके बाद देवी महालक्ष्मी का क्रोध शांत कराया जाता है और उन्हें सम्मानपूर्वक श्रीमंदिर वापस ले जाया जाता है. यह पूरी परंपरा वर्षों से सरायकेला, खरसावां और हरिभंजा में श्रद्धापूर्वक निभायी जा रही है.
खरसावां के गुंडिचा मंदिर के बाहर खड़ी प्रभु जगन्नाथ का नंदीघोष रथ
खरसावां के गुंडिचा मंदिर के बाहर खड़ी प्रभु जगन्नाथ का नंदीघोष रथ

हेरा पंचमी के बाद शुरू होती है बाहुड़ा रथयात्रा की तैयारी
रथ भंगिनी की रस्म पूरी होने के साथ ही भगवान जगन्नाथ की श्रीमंदिर वापसी की तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं. हेरा पंचमी के तीसरे दिन भगवान के रथ को श्रीमंदिर की दिशा में मोड़ा जाता है. इस धार्मिक प्रक्रिया को दक्षिणामुख संस्कार कहा जाता है. इसके बाद निर्धारित तिथि को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा बाहुड़ा रथयात्रा के माध्यम से श्रीमंदिर लौटते हैं. जगन्नाथ परंपरा में इसे भी अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है.

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